जब बाजार नीलामी की राशि लगभग 40000 रु दो साल से विभाग में जमा ना हो, जब गणतंत्र दिवस समारोह के नाम पर 21000 रु से अधिक की राशि खर्च दिखाया जा रहा हो, एक ही दुकानदार के नाम पर चन्द माह के भीतर 50000 रु से अधिक का भुगतान दिखाया जा रहा हो, तब सवाल उठना तो लाजमी है!
आखिर वो कौन लोग हैं जो तंत्र में दीमक बनकर भ्रष्टाचार की सड़ांध पैदा कर रहे हैं?
पानी में रहकर मगर से बैर कौन करे कि तर्ज पर चुप ग्रामीणों की स्थिति के दुष्परिणामों पर आज भले ही सन्नाटा दिखाई देता हो, लेकिन आने वाली पीढ़ियां सवाल जरूर करेंगी — क्या इस तरह कर रहे थे तुम बेदू का विकास?
🏚️ अतिक्रमण और अव्यवस्था की कहानी
अतिक्रमण ने सड़कों का मूल स्वरूप खत्म कर दिया है। कुछ हिस्सों में नालियां बनाई गईं, लेकिन अमानक और बेतरतीब — जिसका खामियाजा घरों के सामने दूषित पानी की निकासी! खेल मैदान और चरनोई भूमि तो यहां सिर्फ कागजों पर ही दिखाई-सुनाई देती है!
🏥 सुविधाओं का अभाव, अव्यवस्थाओं की भरमार
गांव में अस्पताल और मेडिकल शॉप जैसी सुविधाएं भले ही आपको दिखाई न देती हों, लेकिन सट्टा, अवैध नशा और शिक्षा का अल्प स्तर जरूर दिखाई देता है।
बुनियादी सुविधाओं के नाम पर गांव में स्कूल, आंगनबाड़ी, एक मुक्तिधाम और शराब का ठेका — यही विकास की तस्वीर दिखा रहे हैं!
लेकिन जो कुछ नहीं दिखाया जा रहा, वह कागज की उस काली स्याही में कैद है — जिसे देख पाना उतना आसान नहीं, जितना सोचा जाता है!
📑 सवाल जो जवाब मांगते हैं
अगर दो साल की नीलामी राशि अटकी है तो किसके संरक्षण में? यदि समारोहों के खर्च पारदर्शी हैं तो सार्वजनिक क्यों नहीं? क्यों नहीं हर भुगतान का विवरण ग्राम सभा में खुली पढ़त में रखा जाता? सामाजिक अंकेक्षण क्या सिर्फ कागजी औपचारिकता है?
जब वोट जातिगत समीकरण, दबंगई और पैसे-शराब के एवज में दिए जाते हों, तब विकास की आस करना समझदारी नहीं कही जा सकती। चुनावी दावों का खोखलापन और सेवा के वादों की हकीकत अब धीरे-धीरे समझ में आ रही हो — इसकी उम्मीद करना भी शायद बेमानी है।
आज भले ही सन्नाटा है, लेकिन खामोशी भी एक दिन दस्तावेज बन जाती है — और जब दस्तावेज खुलते हैं तो कई चेहरे बेनकाब हो जाते हैं।
बेदू के विकास का सच कागज तय नहीं करेंगे — यह तय करेगा जनता का साहस। और सवाल अभी बाकी हैं…
