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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

खुलेआम सजती है चिलम की महफिल!: नरसिंहपुर

रविवारीय बाजार परिसर इन दिनों चिलमचियों का पसंदीदा अड्डा बना हुआ है! नीम के पेड़ों की छांव में बैठे ये चिलमची खुलेआम चिलम की महफिल सजाने से कोई गुरेज नहीं करते!

स्वाभाविक है जब गांजा इस तरह खुलेआम शहर में बिकता हो तब फिर सड़क पर चिलम सजाने से खौफ कैसा?

दिनदहाड़े उड़ते धुएँ के गुबार अब किसी को चौंकाते नहीं… जिम्मेदार तंत्र जैसे अंधे-बहरे होने का अभिनय करता है।

राहगीर नजरें फेर लेते हैं, दुकानदार चुप्पी ओढ़ लेते हैं और जिम्मेदार तंत्र जैसे अंधे-बहरे होने का अभिनय करता है। सवाल यह है कि आखिर यह बेखौफ माहौल किसके संरक्षण में पनप रहा है?

बाजार या नशे का अड्डा?

बाजार वह जगह है जहां परिवार, महिलाएं और बच्चे खरीदारी के लिए आते हैं। लेकिन उसी परिसर में नशे की महफिलें सजें, तो यह केवल कानून का मज़ाक नहीं, समाज की चेतना पर तमाचा है।

क्या स्थानीय अमले को यह दृश्य दिखाई नहीं देता? या फिर कार्रवाई की फाइलें भी धुएं के छल्लों में उड़ जाती हैं?

अगर शहर में गांजा खुलेआम उपलब्ध है, तो यह केवल छोटे चिलमचियों का मसला नहीं — यह सप्लाई चेन की जड़ तक जाने का विषय है।

आज चिलम की महफिल है…
कल यही नशा किसी घर का चिराग बुझा देगा।

प्रशासन को तय करना होगा — बाजार परिसर रहेगा या नशे का अड्डा? कानून चलेगा या चिलम का धुआँ?

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