जब मीडिया चापलूसी पर उतर आए, तब वह पत्रकारिता नहीं करता — सत्ता का पर्चा पढ़ता है?
आज खबरें पढ़ने वाले लोग नहीं, लगभग विलुप्त प्रजाति हो चुके हैं। रील देखो, स्क्रॉल करो और आगे बढ़ जाओ — यही आज का सूचना तंत्र है। और जो मुट्ठी भर लोग अब भी खबर पढ़ते हैं, उनके सामने असली सवाल यह नहीं कि खबर क्या है, बल्कि यह है कि जो पढ़ रहे हैं, वह खबर है भी या नहीं?
कहीं ऐसा तो नहीं कि खबरों की आड़ में आपको रोज़ गुमराह किया जा रहा है?
जिसे आप समाचार समझ रहे हैं, वह दरअसल किसी की चापलूसी हो सकती है। धर्म का लेबल चिपकाकर परोसी गई एक सुरक्षित कहानी, जिस पर सवाल पूछना अचानक “अपराध” घोषित कर दिया गया हो।
धर्म अब आस्था नहीं रहा, वह एक ढाल बना दिया गया है — सवालों से बचने की ढाल, जवाबदेही से भागने की ढाल, और भीड़ की हिंसा को जायज़ ठहराने की ढाल।
डर जानबूझकर पैदा किया जाता है।
डर इसलिए कि आप महंगाई पर सवाल न करें। डर इसलिए कि भ्रष्टाचार आपकी नजर में न आए। डर इसलिए कि रेत माफिया, शिक्षा माफिया और स्वास्थ्य माफिया आराम से अपना धंधा चलाते रहें!
पहले यह काम सिर्फ राजनीति की ठेकेदारी थी, अब मीडिया का एक बड़ा हिस्सा भी उसी ठेके में शामिल हो चुका है!
खबरें अब सवाल नहीं पूछतीं, वे यह निर्देश देती हैं कि आपको क्या सोचना है! एंकर अब पत्रकार नहीं रहे, वे मंच से नारे लगाने वाले प्रचारक बन चुके हैं!
शीर्षकों में उन्माद है, तथ्यों में सन्नाटा।
जो खुद को किसी पार्टी का प्रवक्ता मान बैठे हों, उनकी खबरों में जनता सिर्फ भीड़ होती है — नागरिक नहीं! और उनसे निष्पक्षता की उम्मीद करना अंधेरे में आईना ढूंढने जैसा है!
महंगाई — खामोशी।
महिला सुरक्षा — त्योहार के बाद।
बेरोजगारी — आंकड़े बदल दो।
गरीबी और भुखमरी — दिखाने लायक चेहरा नहीं।
लेकिन अपराधी, माफिया और बाहुबली? उनके लिए कैमरा है, स्टूडियो है, तालियां हैं।
तो सवाल सीधा है —
जो आपको परोसा जा रहा है, वह सूचना है या सम्मोहन?
समाचार है या प्रचार? पत्रकारिता है या सत्ता की दलाली?
क्योंकि अगर आप अब भी चुप हैं, तो अगली खबर शायद आप पर होगी। और तब सवाल पूछने का मौका किसी ब्रेकिंग न्यूज़ में नहीं मिलेगा।
