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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

ग्राम पंचायत में गबन: सत्ता और अधिकारियों का गठजोड़?

रिपोर्ट | Stringer24 News

सचिव और सरपंच—ये दो नाम ग्राम पंचायतों में गबन और भ्रष्टाचार की किसी भी चर्चा में सबसे पहले उछलकर सामने आ जाते हैं। फाइलों में भी, जांच रिपोर्टों में भी और मीडिया की सुर्खियों में भी। लेकिन क्या सचमुच पंचायतों में चल रहे करोड़ों के गबन का खेल सिर्फ इन्हीं दो चेहरों तक सीमित है?

दरअसल, ग्राम पंचायतों में गबन का खेल सत्ता और अधिकारियों की सहमति और संरक्षण के बिना खेला ही नहीं जा सकता।

मीडिया के रडार पर हमेशा छोटे मोहरे

अधिकांश मामलों में मीडिया की खबरों का रडार सरपंच, सचिव और कभी-कभार जीआरएस तक ही सीमित रहता है। एफआईआर भी इन्हीं के नाम दर्ज होती है, निलंबन भी इन्हीं का होता है और बलि का बकरा भी यही बनते हैं।

लेकिन सवाल यह है कि जिन योजनाओं में लाखों-करोड़ों की राशि आती है, जिनके भुगतान ऑनलाइन सिस्टम से होते हैं, जिनकी मॉनिटरिंग ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर तक दिखाई जाती है—वहां सिर्फ ग्राम स्तर के कर्मचारी अकेले यह सब कैसे कर लेते हैं?

परिपाटी जो बरसों से चली आ रही है

पंचायतों में गबन कोई नई बीमारी नहीं है। यह एक ऐसी परिपाटी बन चुकी है जो बरसों से चली आ रही है। नए सरपंच आते हैं, नए सचिव आते हैं, लेकिन सिस्टम वही रहता है। उन्हें बताया जाता है—काम ऐसे ही होता है, बिल ऐसे ही बनते हैं, मस्टर रोल ऐसे ही भरते हैं।

जो इस धारा के खिलाफ जाने की कोशिश करता है, उसके लिए रास्ते मुश्किल कर दिए जाते हैं। कहीं फाइलें अटकती हैं, कहीं भुगतान रुकता है और कहीं जांच की तलवार लटकने लगती है।

काजल की इस कोठरी में रहकर बिना दाग के निकलना क्या सच में संभव है?

अधिकारियों की भूमिका पर क्यों नहीं सवाल?

हर पंचायत ब्लॉक और जिला स्तर के अधिकारियों के अधीन होती है। तकनीकी स्वीकृति से लेकर भुगतान और ऑडिट तक हर स्तर पर सरकारी अधिकारी मौजूद हैं। फिर भी जब गबन सामने आता है तो उंगलियां सिर्फ नीचे की ओर ही क्यों उठती हैं?

क्या यह मान लिया जाए कि ऊपर बैठे अधिकारी हमेशा अनजान रहते हैं? या फिर यह एक सुविधाजनक चुप्पी है, जिसमें सबको अपना-अपना हिस्सा और अपना-अपना संरक्षण मिलता है?

सत्ता का संरक्षण और जांच की सीमाएं

जब तक सत्ता का संरक्षण रहता है, तब तक गबन भी चलता रहता है। जैसे ही मामला राजनीतिक रूप से असहज होने लगता है, वैसे ही जांच का दायरा तय कर दिया जाता है—इतना ही, इससे आगे नहीं।

नतीजा यह होता है कि असली सूत्रधार हमेशा परदे के पीछे सुरक्षित रहते हैं और सार्वजनिक रूप से कुछ नामों की बलि देकर सिस्टम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है।

सवाल जो अब भी खड़े हैं

  • क्या ग्राम पंचायतों में गबन सिर्फ सरपंच और सचिव की मिलीभगत से संभव है?
  • ब्लॉक और जिला स्तर के अधिकारी आखिर किस भूमिका में होते हैं?
  • क्या हर जांच को जानबूझकर नीचे के स्तर पर ही सीमित रखा जाता है?
  • और सबसे बड़ा सवाल—इस सिस्टम को जवाबदेह बनाने की जिम्मेदारी किसकी है?

जब तक इन सवालों पर ईमानदारी से बात नहीं होगी, तब तक हर गबन की कहानी में चेहरे बदलेंगे, लेकिन कहानी वही रहेगी।

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