सरपंच पति और सचिव की “चिंदी चोरी” गबन की बड़ी साजिश का इशारा?
ग्राम पंचायत चाँदन खेड़ा | जनपद गोटेगांव | जिला नरसिंहपुर
पंचायत में विकास कम, लेकिन केलकुलेटर–रजिस्टर–फोटोकॉपी का ऐसा हिसाब कि खुद हिसाब किताब ही सवालों के घेरे में!
ग्राम पंचायत चाँदन खेड़ा में सामने आए बिल और भुगतान के दस्तावेज़ एक बेहद चौंकाने वाली तस्वीर पेश कर रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि केलकुलेटर, रजिस्टर या फोटोकॉपी खरीदी गई — सवाल यह है कि इतनी छोटी-छोटी खरीदी बार-बार क्यों और किस मकसद से?
📟 केलकुलेटर घोटाला या पंचायत का नया शौक?
12/06/2025 को एक केलकुलेटर 500 रु में खरीदा गया दिखाया गया। फिर 18/09/2025 को 900 रु के दो केलकुलेटर 450 रु प्रति पीस के हिसाब से बिल लगाए गए। इसके बाद 30/11/2025 को 600 रु का एक और केलकुलेटर!
सवाल उठता है — क्या पंचायत में ऐसा कौन सा “महाभारत” चल रहा था कि पांच-पांच केलकुलेटरों की जरूरत पड़ गई?
📒 रजिस्टरों की बरसात, काम कहां?
18/09/2025 को लगभग 116 रजिस्टर 2200 रु में खरीदे गए दिखाए गए। 25/01/2025 को 100 रजिस्टर 1000 रु। 04/02/2025 को 80 रजिस्टर 1200 रु — वह भी गणतंत्र दिवस के नाम पर!
12/06/2025 को 25 रजिस्टर 1900 रु और बिना दिनांक के बिल क्रमांक 74 पर 5 रजिस्टर 375 रु!
क्या पंचायत कार्यालय कोई किताबों का गोदाम बन चुका है, या फिर कागजों में ही “काम” हो रहा है?
📄 फोटोकॉपी: काम का खर्च या कागजी खेल?
30/11/2025 को 2300 पेज फोटोकॉपी का खर्च 4600 रु (2 रु प्रति पेज) दिखाया गया। इसके अलावा तीन अलग-अलग बिलों में 700 पेज की फोटोकॉपी पर 1400 रु का व्यय!
यही नहीं, पंचिंग मशीन की खरीद भी दोहराई गई — कहीं 100 रु, कहीं 120 रु!
यह खरीद है या योजनाबद्ध “चिंदी चोरी”, जहां छोटे-छोटे बिलों में बड़ा खेल खेला जा रहा है?
❓ बड़े सवाल, प्रशासन मौन क्यों?
- क्या वास्तव में पंचायत में इतना कार्य हुआ कि बार-बार स्टेशनरी खरीदी गई?
- क्या इन खरीदारियों का कोई भौतिक सत्यापन हुआ?
- क्या जनपद के जिम्मेदार अधिकारियों ने इन बिलों पर आंख मूंदकर हस्ताक्षर किए?
- या फिर सब कुछ जानते हुए भी चुप्पी साध ली गई?
अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और जनपद पंचायत इस “चिंदी चोरी” के दस्तावेज़ी खेल पर जांच कराएगा या फाइलें ठंडे बस्ते में धूल खाती रहेंगी।
🤝 सरपंच पति–सचिव–रोजगार सहायक: तीन किरदार, एक स्क्रिप्ट?
इन तमाम संदिग्ध खरीदारियों को यदि बारीकी से देखा जाए तो एक बात साफ नजर आती है — यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि सरपंच पति और सचिव के आपसी तालमेल का नतीजा प्रतीत होता है।
बड़े बिलों में पंचायत में लाखों रु की आर्थिक अनियमितता किए जाने के संकेत भी मिल रहे हैं!
पंचायत की वित्तीय शक्तियां भले ही कागजों में सरपंच के नाम दर्ज हों, लेकिन व्यवहारिक रूप से सरपंच पति की दखलअंदाजी और सचिव की कलम मिलकर हर भुगतान को वैधता देती नजर आती है।
सवाल यह है — क्या बिना सरपंच पति की सहमति के ये छोटे-छोटे लेकिन बार-बार के बिल संभव थे?
🧾 ग्राम रोजगार सहायक की भूमिका भी सवालों के घेरे में
पंचायत के रोजमर्रा के कार्य, रिकॉर्ड संधारण और योजनाओं की एंट्री में ग्राम रोजगार सहायक की भूमिका अहम होती है। ऐसे में रजिस्टर, फोटोकॉपी, पंचिंग मशीन और स्टेशनरी से जुड़े इन खर्चों से उसकी अनभिज्ञता मान लेना भी आसान नहीं।
क्या रोजगार सहायक ने इन खरीदारियों का भौतिक सत्यापन किया? क्या वास्तविक आवश्यकता के आधार पर मांग पत्र बनाया गया? या फिर ऊपर से जो कहा गया, वही नीचे उतार दिया गया?
यदि रोजगार सहायक ने आंख मूंदकर एंट्री की, तो वह भी इस अनियमितता का उतना ही जिम्मेदार है।
🏢 जनपद पंचायत के अधिकारियों की चुप्पी क्यों?
इन भुगतानों के बाद सबसे गंभीर सवाल जनपद पंचायत गोटेगांव के जिम्मेदार अधिकारियों पर खड़ा होता है। आखिर किस आधार पर इन बिलों को पास किया गया? किसने मस्टर, वाउचर और भुगतान फाइलों को बिना सवाल किए मंजूरी दी?
- क्या जनपद स्तर पर कोई ऑडिट या आंतरिक जांच हुई?
- क्या स्टेशनरी की इतनी खरीदी का कोई उपयोगिता प्रमाण मौजूद है?
- क्या अधिकारियों ने पंचायत पहुंचकर भौतिक सत्यापन किया?
- या फिर फाइलों पर हस्ताक्षर केवल औपचारिकता बन चुके हैं?
कहीं ऐसा तो नहीं कि पंचायत स्तर की यह “चिंदी चोरी” ऊपर तक की मौन सहमति से फल-फूल रही हो?
⚠️ छोटे बिल, बड़ा खेल!
यह मामला करोड़ों का नहीं है, लेकिन ऐसे ही छोटे-छोटे, बार-बार दोहराए गए खर्च पंचायत व्यवस्था को अंदर से खोखला कर देते हैं। यही तरीका होता है — नजरों से बचकर सरकारी धन निकालने का।
अब सवाल यह नहीं है कि गड़बड़ी हुई या नहीं — सवाल यह है कि जांच कब होगी और जिम्मेदारी तय कब होगी?
यदि इस पूरे मामले में भी जांच नहीं होती, तो यह माना जाएगा कि पंचायतों में भ्रष्टाचार अब अपवाद नहीं, व्यवस्था बन चुका है।
अगले अंक में खुलासा, , किस तरह बड़े बिलों में की गई हेर फेर, , ,
