अफ़सर नहीं रहे जनता के सेवक, अब सत्ता की कठपुतली हैं!
आज हाल ये है कि अफ़सर जनता के नहीं, कुर्सी के गुलाम बन चुके हैं। जिनकी जिम्मेदारी थी आम आदमी की सुनवाई, वही आज सत्ता के इशारों पर आंख बंद करके नाच रहे हैं।
गांव का आदमी चक्कर लगाता रह जाए, आवेदन हाथ में सड़ जाए, लेकिन अगर ऊपर से फोन आ जाए — तो वही अफ़सर मिनटों में खड़े मिल जाते हैं।
कागजों में लोकतंत्र है, फाइलों में संविधान है, लेकिन हकीकत में चलता वही है जो सत्ता चाहती है।
सवाल पूछो तो कहा जाता है — “व्यवस्था पर भरोसा रखो”। लेकिन जब वही व्यवस्था सवालों से भागने लगे, तो भरोसा आखिर किस पर किया जाए?
अमृतकाल, सुशासन और झूठा ढोल
कभी अमृतकाल का नाम लिया जाता है, कभी सुशासन का ढोल पीटा जाता है, और कभी डबल इंजन की रफ्तार गिनाई जाती है।
लेकिन जरा गांव-कस्बों में उतरकर देखिए — बेरोजगारी मुंह बाए खड़ी है, महंगाई कमर तोड़ रही है, और इंसाफ सिर्फ़ किताबों में बचा है।
धर्म और जाति की आग में कौन फायदा उठा रहा?
कहीं अल्पसंख्यक के नाम पर बवाल, कहीं जातिवाद का ज़हर, कभी हिन्दू खतरे में, तो कभी धर्म संकट में।
असल सवाल यह नहीं कि खतरे में कौन है, असल सवाल यह है — इस डर का ठेकेदार कौन है?
धर्म और जाति की आग में रोटी सिर्फ़ सत्ता सेंक रही है, जल आम आदमी रहा है।
महिलाओं की सुरक्षा सिर्फ़ भाषणों तक
मंचों से महिलाओं की सुरक्षा के बड़े-बड़े वादे होते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि बहन-बेटियां दिन-दहाड़े मारी जा रही हैं।
हर साल लाखों महिलाएं और युवतियां गायब हो जाती हैं। जिनका न सुराग, न जिम्मेदारी, न जवाबदेही।
फाइल में लिखा जाता है — “पता नहीं चला”, और सिस्टम चैन की नींद सो जाता है।
ड्रग्स, रेत माफिया और खामोश प्रशासन
ड्रग्स का कारोबार खुलेआम फैल रहा है, युवा पीढ़ी बर्बाद हो रही है, लेकिन कार्रवाई सिर्फ़ छोटे चेहरों पर।
रेत माफिया नदियों को नहीं, कानून को खोद रहे हैं। अफ़सर आंख मूंदे बैठे हैं, क्योंकि हिस्सेदारी ऊपर तक बंधी है!
जब अफ़सर बिक जाए, तो माफिया कानून बन जाता है!
सच कड़वा है, लेकिन जरूरी है
आज ईमानदारी बोझ है, और चापलूसी योग्यता। जो बोले वो देशद्रोही, जो लिखे वो एजेंडा वाला।
जनता पूछ रही है — क्या यही लोकतंत्र है? या फिर सिर्फ़ सत्ता का खेल, जिसमें मोहरे हम हैं?
अगर आज भी नहीं जागे, तो कल सवाल पूछने का हक भी नहीं बचेगा।
