इतिहास बोलना अब अपराध है?
बिजनौर में सवाल पूछने की सज़ा — लोहे की रॉड और धारदार हथियार
उत्तर प्रदेश के बिजनौर से आई यह घटना सिर्फ़ एक आपराधिक वारदात नहीं है, यह उस डर और असहिष्णुता की तस्वीर है, जिसमें इतिहास, विचार और सच बोलना जानलेवा बनता जा रहा है।
गुरुद्वारे के पास बैठकर इतिहास पर चर्चा करना — औरंगजेब की क्रूरता और साहिबजादों की शहादत को याद करना — क्या आज के भारत में यह इतना बड़ा गुनाह हो गया है कि उसकी कीमत आंखों से चुकानी पड़े?
क्या था “अपराध”?
बिजनौर जिले के बढ़ापुर क्षेत्र में रमनदीप सिंह कुछ लोगों के साथ गुरुद्वारे के पास बैठा था। बातचीत के दौरान सिख इतिहास और साहिबजादों के बलिदान का ज़िक्र आया — वही इतिहास, जो किताबों में दर्ज है, जिसे देश ने सदियों से सुना है।
लेकिन जैसे ही औरंगजेब द्वारा साहिबजादों पर किए गए अत्याचारों की चर्चा हुई, कुछ लोग बौखला गए।
सवाल यह नहीं है कि क्या कहा गया, सवाल यह है कि सच से डर किसे लग रहा है?
शब्दों से हथियारों तक
बहस बढ़ी और बहस खत्म होते-होते इंसानियत भी खत्म हो गई। कथित रूप से इस दौरान कुछ युवकों द्वारा रमनदीप पर लोहे की रॉड और धारदार हथियारों से हमला कर दिया।
यह हमला किसी उकसावे का जवाब नहीं था, यह हमला उस मानसिकता का परिणाम था जो सवाल सुनना नहीं, कुचलना जानती है।
आंख पर वार — सोच पर हमला
रमनदीप को गंभीर चोटें आई हैं। आंख पर किया गया वार इतना गहरा है कि उसकी रोशनी जाने का खतरा बना हुआ है।यह दुखद घटना 26 दिसंबर 2025 की शाम की है।
प्राथमिक इलाज के बाद उसे AIIMS दिल्ली रेफर किया गया है।
क्या अब सच बोलने वालों की आंखें फोड़ दी जाएंगी, ताकि वे आगे कुछ देख ही न सकें?
पुलिस कार्रवाई, लेकिन असली सवाल बाकी
- पीड़ित पक्ष की तहरीर पर FIR दर्ज
- मुख्य आरोपी और उसके साथियों की तलाश
- इलाके में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात
कार्रवाई चल रही है, लेकिन समाज के सामने सवाल अब भी खड़े हैं —
- क्या धार्मिक इतिहास पर चर्चा करना अब “उकसावा” कहलाएगा?
- क्या आने वाली पीढ़ी वही इतिहास सुनेगी जो किसी को चुभे नहीं?
- और अगर चुभ गया, तो क्या जवाब हमेशा हथियार होगा?
यह हमला किस पर है?
यह हमला सिर्फ़ एक सिख युवक पर नहीं है। यह हमला उस भारत पर है, जहाँ असहमति ज़िंदा थी, जहाँ इतिहास याद रखना अपराध नहीं था।
साहिबजादों की शहादत किसी एक धर्म की नहीं, बल्कि मानव साहस और बलिदान की विरासत है।
इतिहास को दबाया जा सकता है, बदला नहीं जा सकता। और सच पर हमला करने वाले अक्सर सच से सबसे ज़्यादा डरते हैं।
प्रशासन से सिर्फ़ गिरफ्तारी नहीं, एक स्पष्ट संदेश चाहिए — कि इस देश में सच बोलने वालों की आंखें नहीं फोड़ी जातीं।
