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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

कलेक्टर हो तो ऐसा न हो!

(यही ढोंग तब और तकलीफ देता है जब...)

जनता को कागजी आदेश नहीं, जमीन पर बदलाव चाहिए।

कागजों पर स्याही से लंबे-चौड़े और कड़क आदेश तो निकाल दिए जाएं, लेकिन जमीनी हकीकत और दफ्तरों की रेंगती फाइलों से पूरी तरह अनजान रहें!

मंचों से माइक पर बैठकर बात बड़ी-बड़ी ‘न्याय और पारदर्शिता’ की हो, लेकिन अपने ही नाक के नीचे बैठे अधीनस्थों और भ्रष्ट बाबू-सिस्टम पर कोई नियंत्रण ही न हो!

एक तरफ नशा मुक्ति अभियान का ढिंढोरा पीटा जाए, और दूसरी तरफ नशा माफियाओं के आगे पूरा तंत्र नतमस्तक नजर आए! ये कैसा दोहरा रवैया है?

श्रद्धा या सिर्फ दिखावा?

यही ढोंग तब और तकलीफ देता है जब नर्मदा मैया के तट पर वीआईपी प्रोटोकॉल के साथ आरती उतारकर भक्ति का बड़ा दिखावा होता है।

कैमरों के फ्लैश चमकते हैं, हाथ जुड़ते हैं लेकिन जैसे ही कैमरे बंद होते हैं, नदी का दर्द फिर लावारिस हो जाता है। क्या श्रद्धा सिर्फ दिखावे की है और संरक्षण अंदरूनी?

मेरा मानना है कि ये सिर्फ अपने ‘चेहरे चमकाने’ और अखबारों की सुर्खियां बटोरने वाले ऑफिशियल दौरों का ढर्रा अब बंद होना चाहिए।

औचक निरीक्षण या प्रशासनिक पिकनिक?

रोज सुबह सोशल मीडिया और अखबारों में हेडलाइन सजती है कि, "आज मैडम/सर ने पूरी टीम और लाव-लश्कर के साथ इस क्षेत्र का औचक निरीक्षण किया..."

सच कहूं? तो मेरे विचार से ये तथाकथित 'औचक निरीक्षण' महज एक औपचारिकता, एक तयशुदा स्क्रिप्ट और फोटो-सेशन से ज्यादा कुछ नहीं हैं!

जब साहब के आने की खबर पूरे सरकारी अमले को दो घंटे पहले ही मिल जाती है, जब रास्ते रातों-रात साफ कर दिए जाते हैं, और कमियों को परदे के पीछे छुपा दिया जाता है, तो साहब को खाक जमीनी सच दिखेगा?

यह निरीक्षण नहीं, एक प्रशासनिक पिकनिक है!

आखिर डर किस बात का?

आखिर एक जिले के सर्वोच्च अधिकारी को इतना भी क्या डर?

क्यों कभी वो बंद गाड़ियों के काले शीशों, हूटरों की गूंज और सुरक्षा के इस भारी-भरकम तामझाम को छोड़कर, हुलिया बदलकर, एक आम इंसान की तरह जनता के बीच घूमने नहीं निकलते?

किससे खौफ है साहब को? अपनी ही जनता से? या उस सच से रूबरू होने से जो एसी कमरों तक कभी पहुंचने नहीं दिया जाता?

सिस्टम की असली सड़ांध

इतिहास गवाह है, जब तक आप एक साधारण फरियादी बनकर राशन की दुकान पर कतार में नहीं खड़े होंगे, जब तक आप बिना पहचान बताए किसी बदहाल सरकारी अस्पताल के गलियारे में तड़पते मरीज का दर्द नहीं देखेंगे, और जब तक आप बिना सुरक्षा के किसी थाने की चौखट पर न्याय की गुहार लेकर नहीं जाएंगे — तब तक आपको इस सड़े हुए सिस्टम की असली सड़ांध का अहसास कभी नहीं होगा!

बंद गाड़ियों के वीआईपी कंफर्ट से बाहर निकलिए। जब तक आप सीधे जनता के बीच उनके जैसे बनकर नहीं बैठेंगे, तब तक आप फाइलों के आंकड़ों को तो शायद दुरुस्त कर सकते हैं, लेकिन जनता के असली दर्द और उनकी सिसकियों को कभी नहीं समझ पाएंगे!

बाकी जो कुछ भी तामझाम चल रहा है, मुझे लगता है वो सिर्फ और सिर्फ हेडलाइन मैनेजमेंट है, दिखावा है, और प्रशासनिक ढोंग ही है!
निष्कर्ष :

जनता को कागजी आदेश, प्रेस नोट और फोटो-सेशन नहीं चाहिए। जनता को चाहिए जवाबदेही, ईमानदार निगरानी, पारदर्शिता और जमीन पर दिखाई देने वाला बदलाव। प्रशासन का मूल्यांकन सुर्खियों से नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन में आए सुधार से होना चाहिए।

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