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सच्चाई की कीमत | एक पत्रकार की डायरी

"वो पूछते हैं अर्निंग क्या है... कोई उनसे पूछे कि अंदर से हर रोज़ थोड़ा सा मर जाने की कीमत क्या होती है?"

लोगों को लगता है कि पत्रकारिता का मतलब है रुतबा, माइक और कैमरे के सामने खड़े होकर रौब झाड़ना। लेकिन कोई एक रात के लिए हमारी आँखें उधार लेकर देखे, तो उसे समझ आए कि ये नौकरी नहीं, एक धीमा ज़हर है।

हम 9 से 5 की फाइलों में खुद को नहीं खपाते। हम खपते हैं उस खौफनाक अंधेरे में, जहाँ अमूमन लोग जाने से भी काँपते हैं।

कभी किसी ड्रग तस्कर के ठिकाने पर मौत के साए के बीच खड़े होना, कभी किसी सेक्स वर्कर की कोठी की उस घुटन और चीख को महसूस करना जिसे समाज देखना भी नहीं चाहता, कभी खूंखार अपराधियों के बीच उनके ही गुनाहों का सच उगलवाने के लिए अपनी गर्दन फँसाना, तो कभी सटोरियों और जुआरियों की टोह में भूखे-प्यासे रातें काटना। और जब इन सब से बचकर निकलो, तो भ्रष्ट सिस्टम के उस मगरमच्छ से टकराना, जिसके एक इशारे पर पूरी की पूरी ज़िंदगी तबाह हो सकती है।

सच कहूँ? हम हर रोज़ अपनी जान का सौदा करके घर से निकलते हैं। जब एक आम इंसान किसी वारदात को देखकर पीछे भागता है, एक रिपोर्टर अपनी जान की परवाह किए बिना उस बारूद के ढेर की तरफ दौड़ता है।

लेकिन इस मानसिक प्रताड़ना, इस अकेलेपन और इस ख़तरे का सिला क्या मिलता है?

जब एक लाख से ज़्यादा लोग हमारी उस ख़तरनाक स्टोरी को देखते हैं, तो स्क्रीन पर दिखता है— अर्निंग: $1.02 (मात्र 85 रुपये)।

हँसी आती है इस सिस्टम पर और इस डिजिटल दुनिया पर। दिनभर की फील्ड का पेट्रोल छोड़िए, उस खौफ की भी कोई कीमत नहीं है जो हमारे परिवार वाले हर पल अपने दिल में दबाए रखते हैं कि 'वह घर सही-सलामत लौटेगा या नहीं।' इस नाममात्र की कमाई से पेट पालना भी मुश्क़िल है, जान की हिफाज़त तो बहुत दूर की बात है।

अगर हम भी बिक जाते, अगर हम भी दलाली और चाटुकारिता का रास्ता चुन लेते, तो आज जेबें भी भरी होतीं और ज़िंदगी में ये ख़तरा भी नहीं होता। लेकिन STRINGER24NEWS ने सच का रास्ता चुना।

Meta Verified (ब्लू टिक)

आज हमारे नाम के आगे यह 'मेटा वेरीफाइड' का ब्लू टिक ज़रूर लग गया है, लेकिन इसकी असली कीमत डॉलर में नहीं, हमारे खून और पसीने से चुकाई गई है। यह टिक इस बात का सबूत है कि चाहे जेब खाली हो, पर हमारा ईमान और हमारी रीढ़ की हड्डी आज भी सीधी है।

हम आपसे भीख या हमदर्दी नहीं माँग रहे। हम बस यह चाहते हैं कि जब आप हमारी किसी खबर को देखें, तो सिर्फ उसे एक 'वीडियो' समझकर स्क्रॉल न कर दें। उसके पीछे छिपे एक पत्रकार के इस ख़तरनाक संघर्ष और उसके परिवार के डर को समझें।

हम बिके नहीं हैं, इसीलिए टिके हुए हैं।

अगर आपको लगता है कि इस बिकाऊ दौर में निष्पक्ष आवाज़ का ज़िंदा रहना ज़रूरी है, तो STRINGER24NEWS की ताकत बनिए। खबरों को शेयर कीजिए, क्योंकि आपकी एक शेयरिंग ही हमारी वो अर्निंग है, जो हमें दोबारा मौत के मुँह में कूदने का हौसला देती है।
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