https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi_nXYDircpji_NBp4Y2oyo8rhVeU-DuXusJaP3AW8


 


 


 



AI generated image 

लोकतंत्र चुपचाप नहीं मरता, उसे मारा जाता है?

और इसकी शुरुआत अक्सर धर्मनिरपेक्षता को नज़रअंदाज़ करने से होती है

कभी सोचा है… एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब खुशी मनाने से पहले डर लगेगा?

डर इस बात का नहीं कि कानून क्या कहेगा, डर इस बात का कि भीड़ क्या सोचेगी

जब क्रिसमस मनाने पर सवाल उठते हैं, जब स्कूलों में बच्चों से पूछा जाता है — “इस त्योहार की ज़रूरत क्या है?” तब समझ लीजिए… खतरा त्योहार को नहीं, लोकतंत्र को है।

“जिस समाज में खुशी सफाई देने लगे, वहां आज़ादी देर तक ज़िंदा नहीं रहती।”

सवाल क्रिसमस का नहीं है

आज क्रिसमस सवालों के घेरे में है, कल ईद होगी, परसों कोई और त्योहार।

यह सिलसिला अगर आपको सामान्य लग रहा है, तो रुकिए… यही वह क्षण है जब लोकतंत्र की सांस धीमी पड़ने लगती है

क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछने का हक सबको है, लेकिन खुशी छीनने का अधिकार किसी को नहीं

सबसे डरावनी तस्वीर — युवा

सबसे ज्यादा चिंता तब होती है जब इन घटनाओं में युवा चेहरे दिखाई देते हैं।

वही युवा, जिनसे सवाल पूछने की उम्मीद थी, आज नारे लगाने को तैयार खड़े हैं। वही युवा, जिन्हें भविष्य बनाना था, आज नफरत की राजनीति का औज़ार बनते जा रहे हैं।

“धर्म इंसान को जोड़ता है, लेकिन जब राजनीति उसे उठाती है, तो वह भीड़ में बदल जाता है।”

धर्मनिरपेक्षता कोई समझौता नहीं

यह किसी एक धर्म को खुश करने की नीति नहीं है। यह सबको सांस लेने की गारंटी है।

जिस दिन हमने इसे “ज़रूरी नहीं” समझा, उस दिन तय हो गया कि कल कोई और तय करेगा — आप क्या मनाएंगे, क्या कहेंगे, और कैसे जिएंगे

अब भी समय है

लोकतंत्र को बचाने के लिए सड़कों पर उतरना हर बार ज़रूरी नहीं होता।

कभी-कभी चुप न रहना ही सबसे बड़ा प्रतिरोध होता है।

अगर आपको यह असहज कर रहा है, अगर यह आपको सोचने पर मजबूर कर रहा है, तो समझ लीजिए — यह लेख अपना काम कर रहा है।

© Stringer24 News | सत्य और समाज के बीच की कड़ी
أحدث أقدم

📻 पॉडकास्ट सुनने के लिए यहां क्लिक करें।

🎙️ Stringer24News Podcast

🔴 देखिए आज का ताज़ा पॉडकास्ट सीधे Stringer24News पर