पंचायत में भ्रष्टाचार पर चुप्पी क्यों, साहब?
दफ्तर की मेज पर फाइलें पड़ी हैं। उन फाइलों में शिकायतें हैं। शिकायतों में नाम हैं, तारीखें हैं, सबूत हैं। और उन सबके सामने बैठे हैं अधिकारी — खामोश।
यह खामोशी मामूली नहीं है। यह वही खामोशी है जो पंचायत से निकलकर ब्लॉक और फिर जिला मुख्यालय तक फैल जाती है। यही खामोशी गांव के आख़िरी आदमी को यह समझा देती है कि उसकी आवाज़ दर्ज तो होती है, सुनी नहीं जाती।
सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज होती है, एक नंबर मिलता है, और फिर — सन्नाटा।
न जांच की खबर, न निरीक्षण का पता, न कार्रवाई का कोई संकेत। सिर्फ एक शब्द — “प्रक्रियाधीन।”
सवाल यह नहीं है कि शिकायतें क्यों आ रही हैं। सवाल यह है कि उनका अंत क्यों नहीं होता?
पंचायत में सड़क कागज़ों में बन जाती है। नाली की रकम बिल में बह जाती है। शौचालय फोटो में खड़े हो जाते हैं, लेकिन गांव में ढूंढे नहीं मिलते।
यह सब अचानक नहीं होता, साहब। यह तब होता है जब नीचे भ्रष्टाचार करता है और ऊपर निगरानी सोई रहती है।
क्या अधिकारी यह सब नहीं जानते? जानते हैं। क्या शिकायतें उनके पास नहीं पहुंचतीं? पहुंचती हैं।
तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं होती?
क्योंकि कार्रवाई करने से सवाल उठते हैं। क्योंकि कार्रवाई करने से रिश्ते खराब होते हैं। क्योंकि कार्रवाई करने से सिस्टम असहज हो जाता है।
लेकिन सिस्टम की असहजता से ज़्यादा खतरनाक है जनता का भरोसा टूटना।
जब किसान शिकायत करता है और साल भर इंतज़ार करता है, जब मजदूर सीएम हेल्पलाइन से हार मान लेता है, जब गांव कहने लगता है — “कुछ नहीं होगा…” तब समझ लीजिए कि लोकतंत्र कमजोर पड़ रहा है।
भ्रष्टाचार सिर्फ घोटाला नहीं है। यह रोज़ की छोटी-छोटी चोरियां हैं — जो मिलकर बड़ी लूट बन जाती हैं।
और जब अधिकारी चुप रहते हैं, तो वह चुप्पी खुद एक बयान बन जाती है।
आज पंचायत में जवाबदेही नहीं है। कल ब्लॉक में नहीं होगी। परसों जिले में नहीं होगी।
और फिर हम पूछेंगे — यह सब कैसे हो गया?
साहब, यह लेख आरोप नहीं है। यह चेतावनी है।
अब भी वक्त है। फाइलें खोलिए। जांच कराइए। जनता को यह भरोसा दीजिए कि सरकार सिर्फ विज्ञापन नहीं, जवाबदेही भी है।
क्योंकि अगर सिस्टम चुप रहा, तो सवाल और तेज़ होंगे। और तब खामोशी काम नहीं आएगी।
