सरपंच पति की दलाली, सचिव–जीआरएस की चुप्पी
रातिकरार कला, केरपानी और बारहा बड़ा में भ्रष्टाचार की खुली होली?
कहते हैं काजल की कोठरी में जो जाता है, वह बेदाग लौट नहीं सकता…
और रातिकरार कला व बारहा बड़ा में यही कहावत चरितार्थ होती दिख रही है।
रातिकरार कला, केरपानी और बारहा बड़ा ग्राम पंचायतों की जमीनी हकीकत अब सिर्फ चर्चाओं तक सीमित नहीं रही! यहां पंचायत का संचालन कागजों में महिला सरपंच के नाम पर, लेकिन व्यवहार में सरपंच पति की दलाली और दखल से चलने के आरोप लग रहे हैं?
पंचायत कार्यालय में कौन बैठेगा, किस काम का भुगतान होगा, किस फाइल पर दस्तखत होंगे — यह सब तय करने में सरपंच पति की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। और हैरानी की बात यह है कि सचिव और जीआरएस सब कुछ देखकर भी मौन साधे हुए हैं।
क्या यह मौन मजबूरी है, या फिर कमीशन में बंटा हुआ साझा अपराध?
सचिव और जीआरएस पंचायत में ईमानदारी और नियमों की दुहाई देते नहीं थकते, लेकिन जब पंचायत में महिला सशक्तिकरण को खुलेआम कुचला जाता है, जब सरपंच पति सत्ता के केंद्र में बैठकर फैसले करता है, तब इनकी नैतिकता अचानक गूंगी क्यों हो जाती है?
रातिकरार कला हो, केरपानी या बारहा बड़ा — भुगतान बिना सचिव के हस्ताक्षर के नहीं हो सकता, और एंट्री के बिना जीआरएस का सिस्टम नहीं चल सकता। फिर यह कैसे मान लिया जाए कि भ्रष्टाचार किसी एक व्यक्ति का खेल है?
जब पंचायत में पति सत्ता चलाए और कर्मचारी सिर्फ हिस्सा देखें, तब भ्रष्टाचार अपराध नहीं, व्यवस्था बन जाता है।
यह मामला सिर्फ दो तीन ग्राम पंचायतों तक सीमित नहीं है, यह उस पूरे तंत्र पर सवाल है जो महिला सशक्तिकरण के नाम पर सत्ता की कुर्सी तो देता है, लेकिन असली ताकत उन हाथों में सौंप देता है जिनका चुनाव से कोई लेना-देना नहीं।
अब सबसे बड़ा सवाल — क्या जिला प्रशासन रातिकरार कला और बारहा बड़ा की पंचायतों में सरपंच पति की भूमिका, सचिव–जीआरएस की चुप्पी और कमीशन की इस कथित श्रृंखला की निष्पक्ष जांच कराएगा?
या फिर काजल की कोठरी में बैठा यह पूरा सिस्टम यूं ही जनता की आंखों में धूल झोंकता रहेगा?
