गौशाला या सरकारी धन की खुली लूट?
रातिकरार कला पंचायत में 10 माह में 90 ट्रॉली भूसा खरीद का दावा, ज़मीनी हकीकत पर गंभीर सवाल
करेली जनपद अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत रातिकरार कला की गौशाला इन दिनों चर्चा में है, लेकिन किसी सकारात्मक पहल के कारण नहीं, बल्कि गौशालाओं के नाम पर सरकारी राशि की होली उड़ाए जाने के गंभीर आरोपों को लेकर।
पंचायत रिकॉर्ड के मुताबिक महज़ करीब 10 महीनों में लगभग 90 ट्रॉली भूसा खरीदा गया है। यह आंकड़ा जितना कागज़ों में भारी-भरकम दिखाई देता है, उतना ही ज़मीनी सच्चाई से परे बताया जा रहा है।
ग्रामीणों के अनुसार, गौशाला में मवेशियों की संख्या सीमित है और न तो वहां इतनी खपत दिखाई देती है, न ही भूसे का कोई ठोस भंडारण। इसके बावजूद लगातार भूसा खरीद के बिल लगाए जा रहे हैं, जो सीधे-सीधे अनियमितता और संभावित भ्रष्टाचार की ओर इशारा करते हैं।
अगर वाकई इतने बड़े पैमाने पर भूसा खरीदा गया होता, तो मवेशियों की संख्या अधिक होती, गौशाला में नियमित चारा वितरण दिखता, और ग्रामीणों को इसकी जानकारी होती।
लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि गौशाला की स्थिति सामान्य ही बनी हुई है, जिससे यह आशंका और गहरी हो जाती है कि भूसा नहीं, सिर्फ उसके बिल चल रहे हैं।
गौशालाएं बनती जा रहीं लूट का सुरक्षित अड्डा
यह मामला अकेले रातिकरार कला पंचायत तक सीमित नहीं है। जिले और प्रदेश भर से लगातार ऐसी खबरें सामने आती रही हैं, जहां गौशालाओं के नाम पर चारा, दवा, रख-रखाव और मजदूरी के बिल लगाकर लाखों रुपये निकाल लिए जाते हैं, जबकि ज़मीनी व्यवस्थाएं नदारद रहती हैं।
जिन गौशालाओं को निराश्रित और बेसहारा मवेशियों के लिए संरक्षण और संवेदना का केंद्र बनना था, वही आज सरकारी खजाने में सेंध लगाने का आसान माध्यम बनती जा रही हैं।
सवाल यह भी हैं —
- क्या भूसा खरीद के बिलों का कभी भौतिक सत्यापन हुआ?
- क्या गौशाला में मवेशियों की वास्तविक गिनती कराई गई?
- जनपद स्तर पर निगरानी तंत्र आखिर क्या कर रहा था?
यह पूरा मामला पंचायत से आगे बढ़कर प्रशासनिक उदासीनता और निगरानी तंत्र की विफलता को भी उजागर करता है। यदि समय रहते निष्पक्ष और ईमानदार जांच नहीं हुई, तो गौ-सेवा के नाम पर चल रही यह कागज़ी लूट और भी पंचायतों में बेखौफ जारी रहेगी।
