https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi_nXYDircpji_NBp4Y2oyo8rhVeU-DuXusJaP3AW8


 


 


 


STRINGER24 NEWS

सत्य और समाज के बीच की कड़ी

मोहपानी जेसीबी तालाब गबन के मक्कार अब ईमानदार?

बेशर्मों को गबन करते वक्त शर्म नहीं आई, और जब राज खुला तो आरोप स्थानीय नेताओं के मत्थे मढ़ने लगे?

जिस दिन तक जेसीबी की दहाड़ से मोहपानी का तालाब छलनी किया जा रहा था, उस दिन इन कथित ईमानदारों की आंखों पर पट्टी बंधी थी क्या?

सरकारी तालाब को ऐसे खोदा गया, जैसे कोई निजी संपत्ति हो! तीन लाख रुपए की राशि की खुली लूट हुई— और आज वही चेहरे सफाई देने में लगे हैं?

अब नया जुमला तैयार है!

“इसे गबन मत कहिए, ये तो गांव वालों की मर्जी से हुआ है!”

वाह! क्या गांव वालों ने कहा था कि तालाब को पूरी तरह नोच डाला जाए? क्या गांव वालों ने अनुमति दी थी कि जलस्रोत को गबन के ढेर में बदल दिया जाए?

गांव की मर्जी के नाम पर जेब भरने की यह कौन-सी नई नीति है?

जब फंसे तो नेता याद आ गए!

जैसे ही सवाल उठे, जैसे ही दस्तावेज़ बोले, जैसे ही सच्चाई सामने आई— तुरंत आरोप स्थानीय नेताओं के सिर मढ़ दिए गए।

खुद को पाक-साफ दिखाने की इस कोशिश में इनका झूठ इतना नंगा हो गया कि अब बेशर्मी भी शरमा जाए।

इंसानी जिस्म से लहू की आख़िरी बूंद निचोड़ लेने की चाह रखने वाले ये लोग असल में इंसान नहीं— चांदी के चंद टुकड़ों पर बिके हुए भ्रष्टाचारी हैवान हैं।

जिस तालाब से गांव की प्यास बुझती थी, जहां से पशु, खेती और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य जुड़ा था— उसी तालाब को लूटते वक्त इनका दिल नहीं कांपा।

आज वही बेगैरत बेशर्मी की चादर ओढ़कर नैतिकता का पाठ पढ़ा रहे हैं।

साफ़-साफ़ समझ लीजिए!

गबन को सहमति का नाम देने से गबन, गबन ही रहता है।

मोहपानी का तालाब सिर्फ मिट्टी का गड्ढा नहीं है— यह गांव की अस्मिता है।

और जो इसे लूटेगा, चाहे जितनी सफाइयां दे, इतिहास में उसका नाम भ्रष्टाचारी के तौर पर ही लिखा जाएगा।

यह लड़ाई सिर्फ तालाब की नहीं, यह लड़ाई है लूट के खिलाफ, झूठ के खिलाफ, और उस सड़े हुए तंत्र के खिलाफ जो हैवानों को इंसान साबित करने में लगा है।
© Stringer24News | सत्य और समाज के बीच की कड़ी
Previous Post Next Post

📻 पॉडकास्ट सुनने के लिए यहां क्लिक करें।

🎙️ Stringer24News Podcast

🔴 देखिए आज का ताज़ा पॉडकास्ट सीधे Stringer24News पर