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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

सालीचौका.. उपेक्षा का शिकार?

सालीचौका..उपेक्षा का शिकार?

आजादी के वर्षों बाद भी आज सालीचौका उपेक्षित क्यों दिखाई दे रहा है? अदद बुनियादी सुविधाओं के लिए भी लोगों को तरसना पड़ रहा है!

अतिक्रमण, शराब, सार्वजनिक परिवहन, बेरोजगारी जैसे मुद्दे आज भी हाशिए पर दिखाई दे रहे हैं!

एक तरफ तो वंदे भारत और मेट्रो की बातें की जा रही हैं वहीं दूसरी तरफ आज भी सालीचौका पर्याप्त रेल ठहराव के लिए बरसों से इंतजार कर रहा है।

विकास की राह में क्यों दूर रखा गया सालीचौका?

सालीचौका का नाम आते ही योजनाएं चुप क्यों हो जाती हैं?

बुनियादी ढांचा और सुविधाएं आज भी सिर्फ काग़ज़ों में कैद नज़र आती हैं। सड़कें, सफाई, स्वास्थ्य व्यवस्था — सब अधूरी!

जब गांव–कस्बे डिजिटल इंडिया की बात करते हैं, वहीं सालीचौका में आज भी सड़क, सफाई, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी ज़रूरी व्यवस्थाएं अधूरी हैं। चिंतन का विषय है — योजनाओं का पैसा कहां जाता है?

यहां से गुजरने वाली ट्रेनों में ठहराव की कमी स्थानीय लोगों के लिए बड़ी परेशानी बनी हुई है। नौकरीपेशा युवा, छात्र और मरीजों को यात्रा के लिए अतिरिक्त खर्च और समय झोंकना पड़ता है।

रेल दौड़ गई… ठहराव अटका!

रोज़मर्रा की यात्रा हो या आपातकाल — पर्याप्त ट्रेन न रुकने से जनता परेशान। छात्र, मरीज, नौकरीपेशा लोग हर दिन अतिरिक्त दूरी और खर्च झेलने को मजबूर!

अतिक्रमण और शराब — कस्बे की बड़ी समस्या

शहर का नक्शा अतिक्रमण ने निगल लिया है। युवा पीढ़ी नशे की चपेट में, परिवार और समाज दोनों प्रभावित!

जनता पूछ रही है… जवाब कौन देगा?

क्या सालीचौका सिर्फ वोट बैंक है?

नेताओं के वादे चुनावों के साथ गायब। सरकारों के बदले भी हालात जस के तस!

कस्बा विकास चाहता है… और अब उसकी आवाज़ दबेगी नहीं!

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