📰 STRINGER24NEWS | संपादकीय
सत्य और समाज के बीच की कड़ी
पंचायत के गबन में स्थानीय नेताओं की संलिप्तता?
गांव के विकास का पैसा, गांव की भलाई के लिए — लेकिन असलियत में यह उन लोगों की तिजोरी भरता है जो पंचायत की कुर्सी और सत्ता की मलाई से राजनीति चलाते हैं।
💰 गबन की स्क्रिप्ट गांव में ही लिखी जाती है
कागज़ों में सड़कें बन जाती हैं, पर जमीन पर गड्ढे ही हाथ आते हैं! सूची में नाम जुड़ जाते हैं, पर लाभार्थियों को पता भी नहीं पड़ता — उन्हें कब योजना का लाभ मिला!
“योजनाओं के नाम पर जनता का हक़, नेता और ठेकेदार की जेब में कैद है।”
रिश्तेदारी, दबंगई और वोट की मजबूरी — यही पंचायत राजनीति का असली संविधान बन चुका है?
🧾 जांच से पहले ही सौदे पक्के!
फर्जी बिल, फर्जी नाम, माप में हेराफेरी, ऊपर तक कमीशन का “कट” — गांव-गांव यह खेल जारी है। जांच भी वही करवाते हैं जो खुद आरोपी — फिर सच कैसे जिंदा बचे?
“गांव के विकास से पहले भ्रष्टाचार का विकास हो जाता है।”
🏛️ भाजपा सरकार की नाकामी? गंभीर सवाल
पंचायत के भ्रष्टाचार पर भाजपा सरकार की पकड़ कमजोर ही नहीं — कई बार संदिग्ध भी दिखाई देती है!
लोग दबी जुबान कहते हैं —
“भाजपा की छत्रछाया तले ही पंचायत का यह गबन फल-फूल रहा है!”
जब सत्ताधारी ही ढाल बन जाएं — तो गुनहगार को भला किस बात का डर?
📌 जनता को जागना होगा
कब तक लूट के बदले दावतें और वादों में फंसकर वोट दोगे? अगर गांव का हक़ चाहिए — तो गांव को ही पहरेदार बनना होगा।
- RTI का इस्तेमाल
- सोशल ऑडिट पर दबाव
- Gram Sabha में खड़े होकर सवाल
“विकास के नाम पर गबन की राजनीति अब और नहीं चलेगी!”
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