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संपादकीय

नरसिंहपुर | प्रशासन बनाम ज़मीनी हकीकत

कलेक्टर रजनी सिंह अधीनस्थों पर नियंत्रण रखने में नाकाम?

नरसिंहपुर जिले में विकास जिस रफ्तार से दौड़ रहा है, उससे कहीं दुगुनी रफ्तार से भ्रष्टाचार, माफिया और अपराध आगे निकलते दिखाई दे रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि आदेश दिए जा रहे हैं या नहीं, सवाल यह है कि उन आदेशों का ज़मीन पर कोई वजूद भी है या नहीं?

कलेक्टर कागज़ों में आदेश जारी कर देती हैं, लेकिन अधीनस्थों की फौज मौज में है।

मैडम ने आदेश दिया—तालाब बनाओ! अधीनस्थों ने क्या किया? कागज़ों में चौका पोत दिया! और हैरानी की बात यह कि मैडम को इसकी भनक तक नहीं!

जिला चिकित्सालय का निरीक्षण होता है, फाइलों में सब कुछ दुरुस्त दिखता है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि मरीज परेशान हैं, व्यवस्थाएं चरमराई हुई हैं और अव्यवस्था अब व्यवस्था का ही हिस्सा बन चुकी है।

निरीक्षण हो जाना और समस्या समझ लेना— ये दोनों अलग-अलग बातें हैं।

सीएम हेल्पलाइन की शिकायतों का हाल भी किसी से छुपा नहीं है। कागज़ों में शिकायतें बंद, सिस्टम में सब ठीक—लेकिन आम नागरिक आज भी वही शिकायतें लेकर भटक रहा है।

अब अगर कलेक्टर यह कह दें कि सब कुछ ठीक है, तो उससे क्या फर्क पड़ता है? जब ज़मीनी हालात रोज़ अपनी सच्चाई खुद बयां कर रहे हों।

कलेक्टर के फेसबुक पेज पर एक यूजर ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कमेंट किया कि, भारी बड़ो काम कर दौ, किसानों की बऊ कर दाई प्रशासन ने!

 हालात सिर्फ निरीक्षण करने से नहीं स्थितियों को समझने से बदलेंगे,औपचारिकताएं निभाने से बदलाव नहीं आते!

सवाल सीधा है— क्या प्रशासन सिर्फ रिपोर्टों के लिए चल रहा है या जनता के लिए भी?

सोशल मीडिया पर उठता सवाल: किसानों पर अचानक जुर्माना क्यों?

हाल ही में सोशल मीडिया पर यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है कि मैडम के आदेश पर गन्ना ले जानी वाली डबल ट्रालियों पर 1500 रुपये का जुर्माना लगाया गया। सवाल जुर्माने का नहीं है, सवाल प्रक्रिया और संवेदनशीलता का है।

क्या दो-चार दिन पहले चेतावनी जारी नहीं की जा सकती थी? क्या किसानों को समझाइश नहीं दी जा सकती थी? क्या प्रशासन का यह दायित्व नहीं बनता कि पहले जानकारी दे, फिर कार्रवाई करे?

नियम लागू करना प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन बिना चेतावनी दंड देना प्रशासनिक संवेदनहीनता का उदाहरण है।

गन्ना किसान कोई अपराधी नहीं हैं। वे मौसम, लागत और बाजार की मार पहले ही झेल रहे हैं। ऐसे में अचानक जुर्माना थोप देना यह दर्शाता है कि जमीनी हालात को न समझने की कसम जैसे किसी ने खा रखी हो।

आदेश ऊपर से आते हैं, कार्रवाई नीचे होती है, और पिसता हमेशा वही है—किसान और आम नागरिक।

प्रशासन अगर संवाद छोड़ देगा, तो आदेश केवल डर पैदा करेंगे, व्यवस्था नहीं।

यदि अधीनस्थों पर नियंत्रण नहीं है, तो आदेश महज़ औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। और जब व्यवस्था जवाबदेही से खाली हो जाती है, तब भ्रष्टाचार, माफिया और मनमानी को खुली छूट मिल जाती है।

यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि जनविश्वास के टूटने का संकेत है।

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