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संपादकीय

विक्रम सिंह राजपूत:लेखक/पत्रकार

मनरेगा का नाम परिवर्तन — क्या बदलेंगे हालात भी?

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ग्रामीण भारत के लिए केवल एक योजना नहीं, बल्कि रोज़गार का संवैधानिक भरोसा रहा है। अब इसे “विकसित भारत – रोजगार और आजीविका मिशन गारंटी (ग्रामीण)” यानी VB-G RAM G विधेयक, 2025 के रूप में लाने की तैयारी है।

नाम बदला, सोच बदलेगी?

सरकार का दावा है कि यह बदलाव केवल नाम तक सीमित नहीं रहेगा। गारंटीशुदा रोजगार के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 करने, न्यूनतम मजदूरी में संशोधन और ग्रामीण आय के नए अवसर सृजित करने की बात कही जा रही है। काग़ज़ पर यह सब आकर्षक लगता है।

लेकिन अनुभव बताता है — योजनाएं शब्दों से नहीं, ज़मीन पर असर से आंकी जाती हैं।

खेती के मौसम में मनरेगा पर रोक — विरोधाभास या रणनीति?

इस नए प्रस्ताव को लेकर यह भी कहा जा रहा है कि खेती के सीजन में लगातार 60 दिनों तक मनरेगा के तहत काम नहीं मिलेगा। सरकार का तर्क हो सकता है कि इस अवधि में श्रमिक कृषि कार्यों में लगें, जिससे खेतों में मजदूरों की कमी न हो।

लेकिन यह तर्क ज़मीनी हकीकत से टकराता दिखाई देता है। ग्रामीण भारत में आज भी लाखों छोटे और भूमिहीन मजदूर ऐसे हैं जिनके पास न तो अपनी खेती है, न ही यह गारंटी कि उन्हें खेतों में नियमित काम मिलेगा।

अगर खेती के मौसम में मनरेगा भी बंद और खेतों में काम भी अनिश्चित — तो मजदूर जाए कहां?

गारंटी का अर्थ कमजोर न हो

मनरेगा की आत्मा उसका “गारंटी” शब्द है। अगर किसी विशेष मौसम में काम रोक दिया गया, तो यह गारंटी सशर्त बन जाती है — और सशर्त गारंटी, वास्तव में गारंटी नहीं होती।

यह आशंका भी है कि खेती के सीजन के नाम पर स्थानीय स्तर पर मनमानी, भ्रष्टाचार और काम न खोलने की प्रवृत्ति को वैधानिक ढाल न मिल जाए।

ज़मीनी सच्चाई का इम्तिहान

आज भी कई पंचायतों में मजदूर मजदूरी भुगतान में देरी, काम की अनुपलब्धता और तकनीकी बहानों से जूझ रहे हैं। ऐसे में खेती के मौसम में 60 दिन की रोक उनकी असुरक्षा को और बढ़ा सकती है।

निष्कर्ष

VB-G RAM G विधेयक, 2025 यदि वास्तव में ग्रामीण भारत को सशक्त बनाना चाहता है, तो उसे नाम और आंकड़ों से आगे जाकर मजदूर की वास्तविक जरूरत को समझना होगा।

सवाल आज भी वही है — क्या यह बदलाव ग्रामीण मजदूर के हाथ मजबूत करेगा, या उसकी गारंटी को मौसम के हवाले कर देगा?

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