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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

सालीचौका वेयर हाउस: किसान लाइन में तड़प रहा, अफसर ‘लंच’ के बहाने गायब

यह कोई सामान्य अव्यवस्था नहीं, बल्कि किसानों के सब्र की खुली परीक्षा है। सालीचौका वेयर हाउस पर सुबह छह बजे से किसान खाद और यूरिया की आस में लाइन में खड़े रहे। घंटों बीत गए, धूप चढ़ती गई, लेकिन व्यवस्था नहीं जागी।


“दोपहर एक बजे अधिकारी यह कहकर चले गए कि लंच के लिए जा रहे हैं — लेकिन चार बजे तक न कोई अधिकारी लौटा, न कोई कर्मचारी, न कोई जवाब!”

यह लंच था या जिम्मेदारी से पलायन?

सवाल सीधा है— क्या वेयर हाउस अफसरों की निजी चौपाल बन चुके हैं? क्या किसान का समय इतना सस्ता है कि उसे आधा दिन लाइन में खड़ा रखकर अधिकारी आराम से गायब हो जाएं?

खेती का सीजन चल रहा है, हर घंटा कीमती है। खाद नहीं मिली तो फसल नहीं बचेगी। लेकिन यहां तो किसान की मजबूरी को ही सिस्टम ने अपना हथियार बना लिया।

“अगर किसान देर से आए तो उसका नंबर कटता है, लेकिन अधिकारी गायब हों तो कौन जवाबदेह?

कौन देगा इन सवालों के जवाब?

  • वेयर हाउस में तय समय पर कर्मचारी क्यों मौजूद नहीं थे?
  • लंच का समय कितने घंटे का होता है—एक या तीन?
  • क्या किसी वरिष्ठ अधिकारी ने निरीक्षण करने की जहमत उठाई?
  • किसानों को दिनभर खड़ा रखने की जिम्मेदारी किसकी है?

यह केवल सालीचौका की कहानी नहीं, यह उस सिस्टम की तस्वीर है जो कागजों में किसान हितैषी और ज़मीनी हकीकत में किसान विरोधी बन चुका है।

“क्या कभी कोई अफसर किसान की तरह सुबह छह बजे लाइन में खड़ा होकर इंतज़ार करेगा?”

अब सवाल यह नहीं कि किसान ने कितना इंतज़ार किया— सवाल यह है कि क्या प्रशासन इस अपमान का हिसाब देगा? या फिर किसान यूं ही हर सीजन लाइन में खड़ा होकर सिस्टम की बेरुखी झेलता रहेगा?

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