मुख्यमंत्री के नाम पर पंचायत की जेब साफ?
बरहटा ग्राम पंचायत में ₹8,000 खर्च नहीं, बल्कि नियमों की हत्या है
जब विकास ठप हो, नालियां टूटी हों और गांव की ज़रूरतें अधूरी हों, तब मुख्यमंत्री के जबलपुर आगमन के नाम पर पंचायत का पैसा उड़ाना — यह प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि साफ-साफ दुरुपयोग है।
❖ सवाल उचितता का नहीं, नीयत का है
सरकारी राशि कोई निजी चंदा नहीं है, जिसे वाहवाही या राजनीतिक चाटुकारिता में लुटा दिया जाए। ग्राम पंचायत की एक-एक पाई स्थानीय विकास, जनहित और अनिवार्य कार्यों के लिए होती है। ऐसे में किसी दूसरे शहर — जबलपुर — में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के नाम पर पैसा खर्च करना, यह दर्शाता है कि नियमों को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया।
❖ खर्च या फर्जीवाड़ा?
यदि यह ₹8,000 पंचायत निधि से बिना स्पष्ट शासनादेश, बजट प्रावधान और सक्षम प्रशासनिक अनुमति के खर्च किए गए हैं, तो इसे “आयोजन सहयोग” कहना एक ढकोसला है। ऐसे मामलों में अक्सर खर्च को फर्जी बिल, खानापूर्ति या मनगढ़ंत मदों में दिखाया जाता है — ताकि कागज़ों में सब कुछ “वैध” लगे।
सवाल यह नहीं कि ₹8,000 कम हैं या ज़्यादा — सवाल यह है कि गांव के हक़ का पैसा किसके इशारे पर और क्यों उड़ाया गया?
❖ कार्रवाई होगी या फाइलों में दफन?
ऐसे मामलों में जिला कलेक्टर, जिला पंचायत सीईओ या ऑडिट विभाग द्वारा जांच होना अनिवार्य है। यदि प्रथम दृष्टया अनियमितता सिद्ध होती है, तो सरपंच, सचिव या संबंधित जिम्मेदारों पर वसूली, निलंबन और आपराधिक प्रकरण तक बन सकता है।
लेकिन सवाल वही पुराना है — क्या जांच होगी, या सत्ता के नाम पर यह खर्च भी “सिस्टम की खामोशी” में गुम हो जाएगा?
