STRINGER24NEWS | विशेष खुलासा
पंचायत का गुप्त रेट कार्ड: 200-500 में खबर गायब!
हाल ही में ग्राम पंचायत सचिव का सनसनी खेज ऑडियो सामने आ रहा है।
जहां आप सुन सकते हैं कि, सचिव ऑडियो रिकॉर्डिंग में कह रहा है कि,
“हम तो हर महीने पंचायत के बिल में गबन करते हैं”
लेकिन इसके लिए हमारा मीडिया मैनेजमेंट कैजुअल है।
हम स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस विज्ञापन के अलावा
( 200–500 रु देकर खबर रोक लेते हैं!)
जब हमने पूछा कि क्या यह राशि हमेशा ही 200/500 रु होती है तब एक सचिव ने बताया कि,कभी कभी ही दस से बीस हजार का लेनदेन होता है खबर रोकने के लिए।लेकिन ऐसा आमतौर पर सिर्फ शुरुआती दौर में होता है।इसके बाद जब एक बार संबंध बन गए तो हम कहते हैं कि यह तो आपका सम्मान कर रहे हैं, और फिर 1000 से 500 और 200 रु में हम खबर को दबवा देते हैं।
जब इस मामले की सच्चाई जानने के लिए अन्य ग्राम पंचायतों के सचिवों से बात की तो अधिकांश इस ट्रेड से सहमत दिखाई दिए। “पंचायत के बिल में हर महीने ही हजारों-लाखों का हेर-फेर होता है… और 200-500 रु में कंडीशन हैंडल कर लेते हैं।” जब पूछा कि क्या यह रेट हमेशा इतना ही? एक सचिव ने बताया — ( “कभी-कभी 10-20 हजार तक भी… बस शुरुआत में!” ) फिर रिश्ता जमते ही वापस 500–200 के टोकन में काम !
कुछ सचिवों ने हंसकर कहा —
• तालाब–शौचालय–सड़क — बड़ा ऑफर
• नया पत्रकार — पहले स्वागत, फिर समझौता!
एक अन्य पंचायत पत्रकार ने कहा — > “कभी कहा जाता है — न्यूज़ मत चलाना… कभी कहा जाता है — उनके हिसाब से चलाना… और बदले में थमा दिए जाते हैं 200-500 के नोट।”
(अगर मीडिया मैनेजमेंट 500 रु में हो रहा है तो गबन कितना बड़ा होगा?)
कई पत्रकारों ने बताया — ( सच लिखो — धमकी मिले! चुप रहो — ऊंट के मुंह में जीरे जैसी रिश्वत! )
इस खेल में सबसे ज्यादा चोट किसे लगती है? • मजदूर — जिसकी मजदूरी कागजों में निगल ली जाती है • बुज़ुर्ग — जिनकी पेंशन महीनों अटकी रहती है • किसान — जिनके नाम पर लूट की योजनाएं बनती हैं और सचिव? उनका कॉन्फिडेंस देखिए — ( “1000-2000 खर्च कर लो… मीडिया चुप, अफसर खुश, और हम सुरक्षित!” )
कानूनी प्रक्रिया? F.I.R, जांच, कार्रवाई? इनका नाम लेते ही फाइलें नींद की गोली खा लेती हैं!
जब इस मामले की सच्चाई जानने के लिए अन्य ग्राम पंचायतों के सचिवों से बात की तो अधिकांश इस ट्रेड से सहमत दिखाई दिए। “पंचायत के बिल में हर महीने ही हजारों-लाखों का हेर-फेर होता है… और 200-500 रु में कंडीशन हैंडल कर लेते हैं।” जब पूछा कि क्या यह रेट हमेशा इतना ही? एक सचिव ने बताया — ( “कभी-कभी 10-20 हजार तक भी… बस शुरुआत में!” ) फिर रिश्ता जमते ही वापस 500–200 के टोकन में काम !
कुछ सचिवों ने हंसकर कहा —
“मीडिया भी तो समझदार है…
ज्यादा पैसे देने लगे तो शक कर लेता है कि मामला मोटा है!”
यानी —
गबन भी नियमित, और खबर दबाने का “रेट कार्ड” भी नियमित!
और यह खेल ऐसे चलता जैसे कोई वैध सरकारी प्रक्रिया हो!
📌 सीज़नल भ्रष्टाचार का कैलेंडर:
• स्वतंत्रता दिवस & गणतंत्र दिवस — स्पेशल रेट• तालाब–शौचालय–सड़क — बड़ा ऑफर
• नया पत्रकार — पहले स्वागत, फिर समझौता!
सबसे ख़तरनाक स्थिति — जो पत्रकार शामिल न हो, वह दुश्मन!
धमकी, दबाव, फर्जी शिकायतें — सब तय!
एक अन्य पंचायत पत्रकार ने कहा — > “कभी कहा जाता है — न्यूज़ मत चलाना… कभी कहा जाता है — उनके हिसाब से चलाना… और बदले में थमा दिए जाते हैं 200-500 के नोट।”
(अगर मीडिया मैनेजमेंट 500 रु में हो रहा है तो गबन कितना बड़ा होगा?)
कई पत्रकारों ने बताया — ( सच लिखो — धमकी मिले! चुप रहो — ऊंट के मुंह में जीरे जैसी रिश्वत! )
इस खेल में सबसे ज्यादा चोट किसे लगती है? • मजदूर — जिसकी मजदूरी कागजों में निगल ली जाती है • बुज़ुर्ग — जिनकी पेंशन महीनों अटकी रहती है • किसान — जिनके नाम पर लूट की योजनाएं बनती हैं और सचिव? उनका कॉन्फिडेंस देखिए — ( “1000-2000 खर्च कर लो… मीडिया चुप, अफसर खुश, और हम सुरक्षित!” )
कानूनी प्रक्रिया? F.I.R, जांच, कार्रवाई? इनका नाम लेते ही फाइलें नींद की गोली खा लेती हैं!
पंचायत लूट का यह “काला रेट कार्ड”
अब उजागर होना ही चाहिए।
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