ग्राम पंचायत मोहपानी — एक नाम जो इन दिनों पूरे जनपद में चर्चा में है। कागज़ों में तकरीबन 400000 रु की लागत से तीन तालाब बने, मशीनों से मिट्टी हटी, और मजदूरी फर्जी मजदूरों के खातों में पहुंची! यह कहानी केवल एक गांव की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की है जो *कागजों के आंकड़ों से इंसानों की मेहनत को मिटाने* पर तुली है।
जब यह सवाल उठा — “क्यों मजदूरी नहीं मिली?” — तो जवाब नहीं मिला, बल्कि सलाह मिली — “मामला दबा दो, ज़्यादा मत बोलो।”
क्यों कहा जा रहा है — चुप रहो?
क्योंकि सच बोलना कुछ लोगों के लिए खतरा है। क्योंकि जो सच्चाई सामने आ रही है, वह उन लोगों की नींव हिला रही है जो वर्षों से भरोसे के नाम पर बेईमानी की फसल काटते आए हैं। इसलिए अब डर यह नहीं कि मामला खुल जाएगा — डर यह है कि जनता जाग जाएगी।
“क्या मेरे चुप हो जाने से सच्चाई झूठ में तब्दील हो जाएगी?”
यही तो सबसे बड़ा सवाल है। अगर हम चुप हो जाएं, तो क्या कागजों का झूठ ही सच बन जाएगा? क्या गांव की वो मिट्टी, जिसने मेहनत देखी है, वो भी इस मौन को स्वीकार करेगी?
जब मनरेगा की मजदूरी लूटी जा रही थी…
जब मनरेगा की मजदूरी को कागज़ों में बांटा जा रहा था, तब किसी ने नहीं सोचा कि यह सिर्फ़ गांव की बेइज्जती नहीं, यह खुद के घर की इज़्ज़त पर दाग है।
जो लोग अपने ही गांव वालों की मजदूरी डकार गए, उन्होंने सिर्फ़ एक मजदूर से धोखा नहीं किया, उन्होंने अपनी पत्नी के नाम पर, अपने घर की औरत के नाम पर भी मजदूर दिखाकर उसके हिस्से की इज़्ज़त को भी बेच डाला।
“जब आपने अपनी पत्नी को ही कागज़ों में मजदूर बनाकर लूटा — तो बताइए, शर्म किससे छुपा रहे हैं?”
यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, यह नैतिक पतन है — जहां रोटी के नाम पर रिश्तों का सौदा हो रहा है। और जब कोई यह कहे कि "मामला दबा दो", तो दरअसल वो अपनी गलती नहीं, अपने डर को बचा रहा है।
सवाल उठाना अपराध नहीं — ज़िम्मेदारी है
जो गांव सवाल पूछने की हिम्मत करता है, वो अपने भविष्य को बचाता है। मोहपानी की आवाज़ आज पूरे प्रदेश के लिए आईना है। अगर आज यह आवाज़ दबा दी गई, तो कल कोई और गांव बोलेगा कैसे?
इसलिए, चाहे कितनी भी कोशिश हो जाए, सच दबाया जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता। क्योंकि सच्चाई वही है जो ज़मीन से उठती है — और ज़मीन की सच्चाई कभी खत्म नहीं होती।
रिपोर्ट्स बताती हैं कि कई पंचायतों में तालाब मशीन से बने, मजदूरों की मजदूरी कागजों में चली और अपात्रों पर कृपा बरसाई गई लेकिन पात्रों के खातों में कुछ नहीं पहुंचा।
अगर यही सच है, तो क्या जांच का मकसद सिर्फ़ औपचारिकता था? या फिर किसी को बचाने की कोशिश?
जिनके हाथों में विकास की जिम्मेदारी थी, वो अब जवाब देने से बच रहे हैं। और यही चुप्पी सबसे खतरनाक है — क्योंकि जब व्यवस्था चुप होती है, तो सच्चाई बोलने वालों को अपराधी बना देती है।
“अगर हर बार सच बोलने वाले को ही चुप करा दिया जाए, तो कल कोई बोलेगा कैसे?
”सवाल सिर्फ मोहपानी का नहीं है। यह उस हर गांव का है, जहां ईमानदारी पर दबाव डाला जा रहा है। जहां सच बोलना ‘बगावत’ कहलाने लगा है। लेकिन इतिहास हमेशा गवाह रहा है — सच देर से जीतता है, पर पूरी जीतता है।
✍️ Writer / Journalist — विक्रम सिंह राजपूत
