https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi_nXYDircpji_NBp4Y2oyo8rhVeU-DuXusJaP3AW8


 


 


 

📰 STRINGER24 NEWS

सत्य और समाज के बीच की कड़ी

सरपंच पद महिला के नाम — असल सत्ता पति के हाथ में

करेली जनपद की पंचायतों में महिला सशक्तिकरण का हो रहा है गम्भीर शोषण?

जनपद करेली की कई ग्राम पंचायतों से मिली तस्वीरें और स्थानीय शिकायतें यह साफ़ कर देती हैं कि सरकारी आरक्षण और महिला सशक्तिकरण के दावे जमीन पर सिर्फ कागज़ों तक सीमित हैं। जहाँ पद पर महिलाओं के नाम दर्ज हैं, वहीं वास्तविक निर्णय-शक्ति, फाइलें और आर्थिक नियंत्रण सरपंच पति के पास केन्द्रित है।

"पद महिला का, अधिकार पति का" — यही अब यहाँ की कड़वी हकीकत बन चुकी है।

धरातलीय सच्चाई — महिलाओं की ज़मीन से जुड़ी दर्दनाक दिक़्कतें

  • कई महिला सरपंचों की शिकायत है कि उन्हें योजनाओं और खर्च की जानकारी नहीं दी जाती — फाइलें पहले से पति द्वारा फ़ाइनल की जा चुकी होती हैं।
  • सरकारी मोबाइल और डिजिटल लॉगिन जानकारी पत्नी के नाम होने के बावजूद सरपंच पति ही संचालित करते हैं — ओटीपी और ई-गवर्नेंस की जिम्मेदारी पति के हाथ में है।
  • ग्रामसभा और पंचायत बैठकों में महिला सरपंच की केवल औपचारिक उपस्थिति दर्ज कराई जाती है; फैसले घर बैठे ही तय कर लिए जाते हैं।
  • पंचायत भवन में वही दिखते हैं जिन्हें शासन या जनता ने चुना नहीं — कुर्सी पर अक्सर सरपंच पति ही बैठे मिलते हैं।
  • घरेलू ज़िम्मेदारियाँ और सामाजिक दबाव के चलते कई महिला सरपंच अपने अधिकारों की माँग भी ठुकरा देती हैं—या फिर आवाज़ उठाने के जोखिम नहीं ले पातीं।

कमीशन का तुष्टिकरण और लोकतंत्र की चोट

स्थानीय सूत्रों का कहना है कि फैसलों और ठेकों में कमीशन की दलाली चलती है और उसे अंजाम देने में सरपंच पति ही आगे रहते हैं। यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं — यह लोकतंत्र की आधारशिला पर चोट है। महिला आरक्षण का शाब्दिक रूप से मूर्ति-वाचक होना, जमीनी बदलाव की जगह सिर्फ़ एक मुखौटा बन चुका है।

पंचायत मंत्री के जिले में शर्मसार हालात

सबसे कष्टप्रद सच्चाई यह है कि यह सब उसी जिले में हो रहा है जहां से पंचायत व्यवस्था की निगरानी अपेक्षित है — इससे प्रशासनिक लापरवाही और भी स्पष्ट दिखती है। अगर पंचायत मंत्री के जिले में महिला अधिकारों की स्थिति ऐसी है, तो सवाल उठता है: नीतियाँ सिर्फ़ घोषणाओं तक क्यों सीमित रहती हैं?

"महिला सशक्तिकरण के पोस्टर बड़े-बड़े बोर्डों पर हैं — असल जिन्दगी में महिलाएँ अपने अधिकारों के लिए तरस रही हैं।"

क्या किया जाए — सुझाव और रास्ते

  1. कड़े निरीक्षण और पारदर्शिता: पंचायत खर्च और निर्णयों का आनलाइन ऑडिट और सार्वजनिक पारदर्शिता ज़रूरी है।
  2. डिजिटल पहुँच पर नियंत्रण: सरकारी फोन और ई-लॉगिन केवल नाममात्र न हों — ओटीपी और लॉगिन की जवाबदेही स्पष्ट होनी चाहिए।
  3. स्थानीय निगरानी समितियाँ: महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए ग्रामस्तर पर स्वतंत्र निगरानी समितियाँ गठित की जाएँ।
  4. सशक्त प्रशिक्षण: महिला सरपंचों को निर्णय‑लेने, वित्तीय नियंत्रण और डिजिटल कौशल के ट्रेनिंग प्रोग्राम देने जरूरी हैं।
  5. शिकायत निवारण तंत्र: त्वरित शिकायत निवारण और शिकायतों का सार्वजनिक ट्रैक रिकॉर्ड रखें।

करेली जनपद की यह स्थिति सिर्फ स्थानीय मुद्दा नहीं—यह पूरे राज्य और देश के उन हिस्सों का आईना है जहाँ आरक्षण और सशक्तिकरण के उद्देश्य खत्म कर दिए जाते हैं। यदि इरादे गंभीर हैं तो अब कार्रवाई की ज़रूरत है—कस्टम का नहीं, संविधान का पालन चाहिए।

रिपोर्ट: Vikram Singh Rajput | Stringer24News

© Stringer24News | सत्य और समाज के बीच की कड़ी.
रिपोर्टिंग के लिए स्थानीय फीडबैक/सबूत भेजें — QR/लिंक सेक्शन
QR कोड / लिंक इमेज
Previous Post Next Post

📻 पॉडकास्ट सुनने के लिए यहां क्लिक करें।

🎙️ Stringer24News Podcast

🔴 देखिए आज का ताज़ा पॉडकास्ट सीधे Stringer24News पर