रोटी के बदले बिकती है देह?
कूड़ा बिनने वाली महिलाओं की जिंदगी के अनछुए पहलू
जब हमने निर्णय लिया कि इन महिलाओं की वास्तविक जिंदगी में झांककर देखा जाए, तो अनुमान नहीं था कि इस कूड़े की बदबू के पीछे समाज की ऐसी सड़ांध मिलेगी। कचरे के अंबार में से रोज़गार ढूंढने वाली ये महिलाएँ हर दिन एक नयी चुनौती और एक नये डर के बीच जीती हैं।
🌑 मजबूरी का दूसरा नाम: शोषण
सुबह चार बजे जब शहर सो रहा होता है, ये महिलाएँ बोरी लेकर निकल पड़ती हैं। लेकिन असली खतरा तब होता है जब सुनसान स्थानों पर कुछ लोग उनके हालात का फायदा उठाते हैं। दस-दस घंटों की मेहनत करने वाली इन महिलाओं को अक्सर यह सुनना पड़ता है: “दो मिनट बैठ जा, पाँच सौ दे दूँगा।”
🤧 बीमारी, दर्द, और बेबसी
टूटी शीशियाँ, इस्तेमाल की हुई सुइयाँ, सड़ा हुआ मेडिकल वेस्ट—यही इनका रोज़मर्रा है। संक्रमण, एलर्जी, सांस की दिक्कतें लगातार उनका पीछा करती हैं। लेकिन इससे भी ज्यादा चुभता है समाज का व्यवहार—जो उन्हें ‘गंदी’ समझता है, न कि ‘मजबूर’।
“हम मना करें तो वे कूड़ा डालने ही नहीं देते... फिर बच्चे क्या खाएँगे?” — एक महिला की पीड़ा
🔥 सवाल सिर्फ गरीबी का नहीं—सवाल व्यवस्था का है
योजनाएँ फाइलों तक सीमित हैं। सुरक्षा का कोई सिस्टम नहीं। वैकल्पिक रोजगार तक पहुँच नहीं। और इन सबके बीच यह महिलाएँ सिर्फ जी नहीं रही—लड़ रही हैं। हर दिन, हर घंटे।
- कूड़ा बीनने वालों का पंजीकरण व सामाजिक सुरक्षा कार्ड
- मेडिकल कैंप व PPE उपलब्ध कराना
- महिला सुरक्षा हेल्पलाइन से जोड़ना
- वैकल्पिक कौशल प्रशिक्षण व रोजगार
फोटो / वीडियो / लेख भेजें:
📲 9343304972
(WhatsApp – आपकी पहचान पूरी तरह सुरक्षित)
