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क्या यह है नरसिंहपुर में मीडिया का असली रूप?

रिपोर्ट : विक्रम सिंह राजपूत | विशेष पड़ताल

नरसिंहपुर ज़िले में पत्रकारिता का चेहरा अब सवालों के घेरे में है। जिस मीडिया को समाज की आँख कहा जाता था, वही अब कई जगह सत्ता और अपराध के साथ सांठगांठ में दिख रहा है। गबन करने वाले सरपंच-सचिवों से लेकर सट्टे, जुए और गांजे के कारोबारियों तक — हर जगह से वसूली की खबरें लगातार उठ रही हैं। सवाल है — क्या यह पत्रकारिता है या सुरक्षा कवच के नाम पर चल रहा कारोबार?

"जहां खबर छापनी चाहिए, वहां सौदेबाज़ी हो रही है। जहां सच बोलना चाहिए, वहां चुप्पी बिक रही है।"

ग्राम पंचायतों में गबन — मीडिया की चुप्पी क्यों?

कई ग्राम पंचायतों में लाखों के गबन की शिकायतें महीनों से चल रही हैं। लेकिन स्थानीय मीडिया का रवैया चौंकाने वाला है। खबरें तैयार होती हैं, लेकिन पब्लिश होने से पहले “समझौते” हो जाते हैं। ग्रामीण अब खुलेआम कह रहे हैं कि “जो पत्रकार पहले खुलासे करते थे, अब वही चाय और लिफाफों से शांत हो जाते हैं।” यह मौन ही सबसे बड़ा सबूत है कि मीडिया अब सच्चाई नहीं, सुविधा देखता है।

सट्टा, जुआ, गांजा — और ‘मासिक कलेक्शन’?

सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, शहर से लेकर ब्लॉक स्तर तक सट्टे और गांजे के कारोबारियों से “मासिक कवरेज फीस” ली जा रही है। खबर दबाने के एवज में नकद, मोबाइल रिचार्ज और गिफ्ट कार्ड तक चल रहे हैं। यही कारण है कि वर्षों से जिले में जुए-सट्टे का कारोबार फल-फूल रहा है, लेकिन मीडिया की ख़बरों में इनका नाम तक नहीं आता। क्या यह पत्रकारिता का पतन नहीं?

“नरसिंहपुर में अब खबर नहीं बिकती — खबरें तय दर पर दबाई जाती हैं।” — स्थानीय सूत्र

जनता में आक्रोश, लेकिन डर गहरा

गाँवों और कस्बों में लोग सब जानते हैं, पर बोलने से डरते हैं। कुछ पत्रकार प्रशासनिक अधिकारियों के साथ गठजोड़ बनाकर शिकायतकर्ताओं को ही दोषी ठहराने की कोशिश करते हैं। इसने मीडिया पर जनता का भरोसा तोड़ा है। लोग अब कहते हैं — “पत्रकार आता है तो खबर नहीं, नोट उड़ जाते हैं।”

क्या प्रशासन आंख मूंदे बैठेगा?

जब फर्जी प्रेस कार्ड लेकर घूमने वाले लोग विभागीय स्तर पर “कवरेज रोकने” की धमकी दें, तो ये सिर्फ मीडिया की नहीं, शासन की नाकामी भी है। क्या प्रशासन अब भी सोता रहेगा, या इन तथाकथित पत्रकारों की कमाई पर अंकुश लगाएगा?

“अगर चौथा स्तंभ ही बिक जाए, तो लोकतंत्र कब तक टिकेगा?”

अब वक्त है सफाई का — मिशन की तरह

पत्रकारिता को बचाना है तो सच्चे पत्रकारों को आगे आना होगा। अब वक्त है कि जिले में एक ‘मीडिया शुद्धिकरण अभियान’ शुरू किया जाए। वरना आने वाले सालों में नरसिंहपुर की पत्रकारिता, इतिहास नहीं, भ्रष्टाचार का केस स्टडी बनकर रह जाएगी।

अगले अंक में जारी :

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