*भ्रष्टाचार में लिप्त सचिव और जीआरएस जानते हैं कि,सिस्टम बिका हुआ है?*
।। समीक्षा।।
भ्रष्टाचार की दीमक ने तंत्र के बुनियादी ढांचे को गंभीर क्षति पहुंचाई है,उस पर चाय के साथ मलाई लेने वाले कारिंदों ने एक तो कोढ़ ऊपर से खाज वाली स्थिति को निर्मित कर दिया है!
अब इन सबके बीच बहती गंगा में हाथ धोने का अवसर भला सचिव और जीआरएस कैसे खो सकते थे?सो लगे फिर सेवा के नाम पर मेवा बटोरने! साथ में सरपंच को भी शामिल किया ही जाता है,रही बात जनपद अधिकारियों की तो कमीशन का मेवा मिलता रहता है, तब तक कृपा बरसती रहती है!
दरअसल खुलेआम व्यापक स्तर पर गबन करने वाले सचिव, जीआरएस और सरपंच के हौसले इसलिए बुलंद हैं,क्यों की वे जानते हैं कि सिस्टम बिका हुआ है, तंत्र के कारिंदों को चाय के साथ मलाई खासतौर पर पसंद है!गरीब के आसूंओं का यहां कोई मोल नहीं है!ऐसा प्रतीत होता है जैसे मानवता,सेवा,प्रेम,विकास खोखले कागजी शब्दों से ज्यादा कुछ भी नहीं!आज भी आबादी का एक बड़ा हिस्सा गरीबी, बेरोजगारी से जूझ रहा है!
कभी कभी तो ऐसा प्रतीत होता है कि,ग्रामीण खुद ही अपनी स्थितियों से उबरना नहीं चाहते हैं!उन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि,बेरोजगारी,अशिक्षा,मंहगाई,भ्रष्टाचार और शोषण का उनके जीवन पर क्या असर पड़ रहा है?ग्रामीणों ने चुप्पी साधकर यह स्वीकार किया कि जो हो रहा है,उन्हें स्वीकार है? गांव को लूटते हुए देखने पर भी जब ग्रामीण खुद ही खामोश हों,तब ऐसे मुर्दा जमीरों को जगाया भी कैसे जाए?
यह मत सोचिएगा कि , ग्राम पंचायत में गबन के जो मुद्दे मीडिया की सुर्खियों में छा जाते हैं, उन पर गंभीर कार्यवाही होती होगी! हां कार्यवाही किए जाने का तमाशा जरूर किया जाता है!नतीजतन आर्थिक अनियमितताओ के दोषी खुलेआम कहते हैं कि,हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता! एक लम्हे के लिए तो लगता है कि,ये लोग सच ही कहते हैं!
सरपंच सचिव जीआरएस और तंत्र के कारिंदों के बीच कमीशन का जो गठजोड़ है!वह फेविकोल के जोड़ से भी मजबूत है!जो चले सालों साल! चोर चोर मौसेरे भाई की तर्ज पर सब मिलकर ग्रामीणों को सिर्फ बेवकूफ बना रहे हैं?
ग्रामीण आखिर अपने नागरिक अधिकारों की ही तो बात कर रहे हैं!फिर प्रशासन क्यों लोकतान्त्रिक मूल्यों का पालन क्यों नहीं कर रहा है। यह अब तक साफ तौर पर जाहिर हो चुका है कि, ग्राम पंचायत में होने वाला गबन एक बड़े स्कैम का एक छोटा सा हिस्सा है!सरपंच,सचिव, जीआरएस,ठेकेदार इस गबन के खेल की खास मोहरें हैं!
हां कभी कभी गांव से शिकायत करने वाले सामने आते हैं लेकिन प्रलोभन और साम दाम दंड भेद के फेर में वो भी उलझ ही जाते हैं!अनगिनत शिकायतों के रिकॉर्ड को जब खंगाला गया तो यह सच निकल कर सामने आया कि,कई बार ग्रामीण क्षेत्रों से उठने वाली शिकायतें सौदेबाजी और समझौतों में तब्दील हो जाती हैं!
जारी :
