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*मुहर्रम : सब्र और त्याग : का पैगाम।*

मुहर्रम इस्लाम धर्म का पहला महीना होता है।मुहर्रम गम और मातम का महीना है।इस महीने का दसवां दिन बेहद अहम होता है।

मुसलमान जो ग़म ए हुसैन मनाते हैं, शाम से ही घरों में चूल्हा नहीं जलाते, बिस्तर पे आराम से नहीं सोते, दिन मैं भी शाम के पहले खाना नहीं खाते और पानी नहीं पीते।

कर्बला की जंग सच और झूठ की लड़ाई थी। कहा जाता है कि,इमाम हुसैन की सेना में 32 घुड़सवार और 40 पैदल सिपाही थे (2) दूसरी तरफ़ उमरे सअद की सेना में लगभग 30000 के क़रीब सिपाही थे।

पैगम्बर मुहम्मद (सल्लाहु अलैहि वसल्लम) के नवासे हुसैन इब्ने अली और उनके भाई, साथियों की शहादत इसी महीने में हुई थी इसलिए इस महीने को गम का महीना भी कहा जा सकता है।कर्बला में लगभग सन ६८० में कर्बला की जंग हुई थी।

मोहम्मद मुस्ताफ़ा के नवासे ईमान हुसैन ने जब यजिद को खुदा मानने से इनकार कर दिया तो यजिद ने उनके खिलाफ जंग का एलान कर दिया इस जंग में हजरत हुसैन और परिवार बड़े बच्चे महिलाओ का क़त्ल कर दिया गया।

7 मुहर्रम से यज़ीद की फौजों ने नदी पर पहरा बिठा दिया और हुसैन की फौजों तक पानी का पहुँचना बन्द हो गया और खाद्य-सामग्री के रास्तों की नाका बंदी कर दी गयी।

यहां तक कि इमाम हुसैन के 6 महीने के बच्चे अली असग़र पर भी तरस न आया और उन्होंने उसका भी गला काट दिया और सभी के सरों को भालों की नोक पर टांग दिया गया।

मासूम बच्ची सकीना को तमाचे मार-मार कर इस तरह से उसके कानो से बालियाँ खींची गयी के उनके कान के लौ कट गए।अनैतिकता की हद तो यह थी कि शहीदों की लाशों को दफन तक न होने दिया।

हुसैनी ब्राह्मण कर्बला की जंग में इमाम हुसैन के लिए लड़े थे।ये वो समुदाय है जिसने हुसैन इब्न अली यानी इमाम हुसैन की करबला की लड़ाई में सहायता की थी।

हुसैन चाहते थे कि जान इस तरह दें कि दुनिया को अच्छी तरह मालूम हो जाय कि हुसैन ने क्यों जान दी, और किसने उनको मारा?

भारतीय समाज में हज़रत इमाम हुसैन की याद न केवल मुस्लिम समाज में रही है बल्कि ग़ैर मुस्लिम समाज में मानवता के उस महान नेता की स्मृति बड़ी श्रद्धा के साथ मनाई जाती है। मोहम्मद साहब ने जो इस्लाम दिया था वह ज़ुल्म और दहशतगर्दों का इस्लाम नहीं बल्कि अमन शांति और सब्र का इस्लाम है।

क्या आप जानते हैं कि मुहर्रम क्या है और मुहर्रम क्यों मनाया जाता है? आज के लेख में हम इसी के बारे में बात करेंगे।

रमजान के महीने के बाद मुहर्रम सबसे पवित्र महीना माना जाता है। मुहर्रम मुसलमानों के लिए खुशी का त्योहार नहीं बल्कि शोक और समर्पण का त्योहार है।

वर्ष 680 में कर्बला नामक स्थान पर एक विशेष धार्मिक युद्ध हुआ। ऐसा कहा जाता है कि मुहर्रम के महीने का दसवां दिन वह दिन होता है जिस दिन हुसैन अली शहीद हुए थे।

पैगंबर मुहम्मद स. उनके पोते की शहादत और कर्बला के शहीदों के बलिदान को याद किया जाता है।

मुहर्रम के 10 दिनों तक शिया समुदाय के लोग काले कपड़े पहनते हैं। वहीं अगर मुस्लिम समाज के सुन्नी समुदाय के लोगों की बात करें तो वे मुहर्रम के 10 दिनों तक उपवास रखते हैं।

विभिन्न स्थानों पर पानी के बर्तन और शरबत छबील लगाए जाते हैं।

इमाम हुसैन हमेशा के लिए मदीना छोड़कर परिवार और कुछ प्रियजनों के साथ इराक की ओर जा रहे थे। लेकिन कर्बला के पास यज़ीद की सेना ने उनके काफिले को घेर लिया. यज़ीद ने उनके सामने शर्तें रखीं जिन्हें इमाम हुसैन ने मानने से साफ इनकार कर दिया। शर्त न मानने के एवज में यजीद ने मारपीट करने की बात कही।

यजीद से बात करते हुए इमाम हुसैन अपने काफिले के साथ इराक के रास्ते में फुरात नदी के किनारे तंबू लगाकर रुक गए। लेकिन यजीदी सेना ने फरात नदी के किनारे से इमाम हुसैन के तंबू हटाने का आदेश दिया और उन्हें नदी से पानी निकालने की भी अनुमति नहीं दी।

इमाम ने लड़ने का इरादा नहीं किया क्योंकि उनके काफिले में केवल 72 लोग थे। जिसमें छह माह का बेटा, बहन-बेटी, पत्नी और छोटे बच्चे शामिल थे। यह तारीख मुहर्रम थी, और गर्मी का समय था। गौरतलब है कि आज भी इराक (मई) में गर्मियों में दिन में सामान्य तापमान 50 डिग्री से अधिक रहता है। सात मुहर्रम तक, इमाम हुसैन के पास भोजन और विशेष रूप से पानी की मात्रा समाप्त हो गई थी।

इमाम धैर्य से काम लेते हुए युद्ध टालते रहे। 7 से 10 मुहर्रम तक उनके परिवार के सदस्य और अनुयायी भूखे-प्यासे रहे।

मुहर्रम की 10 तारीख को एक-एक कर इमाम हुसैन की तरफ जाने वाले ने यज़ीद की सेना से लड़ाई की। जब इमाम हुसैन के सभी साथी मारे जा चुके थे, तब अस्र (दोपहर) की नमाज के बाद इमाम हुसैन खुद गए और वे भी शाहिद हो गए। इमाम हुसैन के बेटे ज़ैनुलाबेदीन में से एक बच गया क्योंकि वह 10 वीं मुहर्रम को बीमार था और बाद में मुहम्मद साहब की पीढ़ी आई।

इसी कुर्बानी की याद में मुहर्रम मनाया जाता है। कर्बला की यह घटना इस्लाम की रक्षा के लिए हजरत मोहम्मद के परिवार द्वारा किया गया बलिदान है।इमाम हुसैन और उनके पुरुष साथियों और रिश्तेदारों को मारने के बाद, यज़ीद ने हज़रत इमाम हुसैन के परिवार की महिलाओं की गिरफ्तारी का आदेश दिया।

यजीद ने खुद को विजेता बताते हुए हुसैन के लूटे गए काफिले को देखने वालों से कहा कि यह उनकी किस्मत है जो यजीद के शासन के खिलाफ गए। यज़ीद ने मुहम्मद के घर की महिलाओं पर अत्याचार किया। उन्हें जेल में रखा गया जहां हुसैन की मासूम बच्ची सकीना (सीरिया) की जेल में मौत हो गई।

हालाँकि, इस घटना को 1400 साल से अधिक समय बीत चुका है। कत्ल-ए-हुसैन असल में मार्ग-ए-यजीद है। इस्लाम हर कर्बला के बाद जिंदा है।

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