*न्याय की उम्मीद करें भी या नहीं?*:नरसिंहपुर जिले की ग्राम पंचायतों के बदतर हालात!*
करोड़ों रुपए का गबन हो जाता है और प्रशासन चुप रहता है!किसी की पेंशन डकार ली तो चुप्पी!किसी का प्रधान मंत्री आवास हड़प लिया तो चुप्पी!किसी का शौचालय डकार गए तो चुप्पी!सड़क और नाली खा गए तो चुप्पी!मुक्तिधाम,तालाब और वृक्षा रोपण पर पोछा लगा दिया तो चुप्पी!मध्याह्न भोजन बच्चों की थाली के बदले बाजार में जाए तो चुप्पी!गरीब को हिकारत और पैसे वाले को मुफ्त सरकारी राशन पहुंच जाए तो चुप्पी!
कितना हैरान कर देने वाली बात है की, गरीब के हिस्से की हर योजना को कमाई का साधन बना लिया और फिर चुप्पी साध कर बैठ गए!
अब गरीब करेगा क्या? न्याय की उम्मीद करेगा!लेकिन किससे? यहां तो हर विभाग में विभीषण बैठे हैं।जिसकी शिकायत करने जाओगे उसी को जांच टीम का सरदार बना दिया जाएगा।ऐसा लगता है ,चारो तरफ लूट की छूट मिली हुई है?
बेचारा गरीब ग्रामीण न्याय की आस लिए सरपंच,सचिव जीआरएस के चक्कर लगाएगा।जनपद से लेकर जिला तक दौड़ेगा। सीएम हेल्प लाइन 181 पर शिकायत करेगा,जनसुनवाई में जायेगा।आवेदन पर आवेदन देगा।लेकिन क्या उसे न्याय मिलेगा?और इसके पहले कितने लोगों को इस तरह से न्याय मिला है? यहां न्याय मिलता नही है,न्याय मिल रहा है ऐसा दिखावा किया जाता है!
अब आप सीएम हेल्प लाइन पर शिकायत को ही ले लें।जैसे ही शिकायत दर्ज होती है तो अधिकारी निराकरण से पहले ही मान मनौव्वल में लग जाते हैं।फिर भी बात न बने तो प्रलोभन और दबाव जैसे शस्त्र तो फिर हैं ही!जमीनी स्तर पर सीएम हेल्प लाइन शिकायतों के निराकरण की स्थिति बिल्कुल भी ठीक नहीं है।हफ्तों,महीनो और यहां तक कि कभी कभी तो सालों गुजर जाते हैं लेकिन कोई कार्रवाई नहीं दिखाई देती।
ऐसे ही हालात जनसुनवाई के हैं।छोटी मोटी समस्या का निराकरण का शोर ऐसे मचाते है जैसे आसमान से चांद तोड़ लाए हों।हमने एक स्टिक , एक व्हील चेयर दे दी,हमने राशन की पर्ची दे दी,हमने नाले को सफाई कर दी जैसे कामों को इतना बढ़ा चढ़ाकर दिखाएंगे की आपको लगेगा की बस अब तो जनसुनवाई के दरवाजे तक पहुंचने की देर है और न्याय मिल ही गया समझो।लेकिन क्या यह हकीकत है?
जनसुनवाई में सरकारी भूमि पर अतिक्रमण की कितनी शिकायतें लंबित है?गबन और गोलमाल की कितनी शिकायतों का निराकरण कर दिया गया?कितने दोषियों के विरुद्ध जांच कर एफआईआर दर्ज कराई गई?ऐसे ही और भी सैंकड़ों मुद्दे हैं जो जनसुनवाई के इस तमाशे में गुम हैं। प्रशासन कब तक आम जनता को बहला फुसलाकर बेवकूफ बनाने की कोशिश करता रहेगा?
ज्ञापन देना भी यहां किसी खेल तमाशे से बढ़कर दिखाई नही दे रहा।मानवीय संवेदनाओं का उपहास किस तरह उड़ाया जाता है यह तंत्र की शैली से समझा जा सकता है?
प्रत्येक नागरिक के जीवन और मौलिक अधिकार की सुरक्षा का दायित्व शासन और जिला प्रशासन का है।यदि आप ऐसा नही कर पा रहे तो आप जनसेवा नही कर रहे हैं और यही सत्य है।
न्याय व्यवस्था संदेह की नजरों से देखी जा रही है लेकिन किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है? आम आदमी की उम्मीदें टूट रही है क्या इसका अहसास भी है जिला प्रशासन को?गरीब का भविष्य दांव पर लगाया जा रहा है लेकिन यहां किसी को इस बात की परवाह हो ऐसा दिखाई तो बिलकुल भी नहीं दे रहा है।
आज भी कई गरीब परिवार ऐसे हैं जिनके यहां चूल्हा नहीं जला है।किसी की लड़की की शादी है तो किसी को इलाज के लिए बाहर जाना है,कोई छात्रवृत्ति से पढ़ने का मन बना रहा है तो कोई लोन लेकर रोजगार करने का ख्वाब देख रहा है। क्या इसका अहसास है आपको?नही आम जनता तो सिर्फ एक नंबर है आधार नंबर, आम जनता को सिर्फ टैक्स पैदा करने और वोट बनाने की मशीन समझ लिया गया है।
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