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*सरपंच सचिव और अधिकारियों के गबन से आपको दिक्कत क्या है?*

देखिए सबसे पहले तो आप मान लीजिए कि शहर में सब ठीक चल रहा है,विकास हो रहा है और सुशासन आ गया है!खैर नहीं भी मानेंगे तो आपके मनाने या ना मनाने ने कौन सा कद्दू में तीर मार लिया है!इसलिए आपकी भलाई सिर्फ मनाने में है,इन सब कारणों के पीछे कौन है यह जानने में नही!इतना समझदार होने की तो उम्मीद आपसे की ही जा सकती है!

चलिए अब मुद्दे पर आते हैं,मुस्कुराइए आप हमारे शहर में हैं!

सड़क पर चलते चलते आवारा मवेशियों का झुंड मिल जाए या फिर सांडों और शवानों के उत्पात से आपका सामना हो जाए तो मुस्कुराइए,और भला आप कर ही क्या सकते हैं,ज्यादा से ज्यादा प्रशासन को कोसने के सिवाय?और फिर तुमको किसने हक दिया है प्रशासन को कोसने का?

वैसे भी मध्यम वर्गीय आदमी हो!तुम्हारी मांगे तो कभी खत्म होने से रही। अब देखो सड़क बना दी तो फूटपाथ के लिए कोसते हो!सरकार को मंहगाई,बेरोजगारी के लिए तो स्थानीय प्रशासन को रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के लिए कोसते हो!

तुम मध्यम वर्गीय ऐसे ही होते हो,अमीर को देखा है ,कभी किसी को कोसते हुए!हालाकि कौआ कोसे ढोर नही मरे,फिर भी तुमने देखा है क्या?अमीर लोग है,सीधे हड़का देते हैं,कोसने वोसने का कोई टेंशन ही नही!टेंशन तो तुम मध्यम वर्गीय की है!और बड़े बुजुर्ग भी कह गए हैं, चिंता चिता समान!इसलिए तो कहता हूं,बस मुस्कुराइए आप हमारे शहर में हैं,और कोई चारा भी तो नही है आपके पास!

और अगर थोड़ा बहुत चारा है भी तो उसे गौ भूमि पर अतिक्रमण करने वाले को ही खा लेने दीजिए,बेचारा चारा खाकर ही कर लेगा गुजारा!वरना शासन को तो आप जानते ही हैं,अगर उसे पता पड़ा तो वो इन चारा डकारने वालों को दस बीस साल तक इतना चारा खिलाएगा की,आप भी मुस्कुराते हुए कहेंगे कि,वाह क्या सीन है?

सड़क पर कोई खुलेआम हल्का होने लगे और आप फिर प्रशासन को कोसने लगे,तो बात बिगड़ जाएगी,भाई अब वो बेचारा हल्का भी नही हो सकता है क्या,कैसी मूर्खता पूर्ण बाते करते हो, नेचर कॉल है,जाना तो पड़ेगा ही, अब आप रो चाहे, कोसो या फिर मुस्कुराओ!प्रशासन और नेचर कॉल पर किसका बस चलता है?

तो अब तक आप समझ गए होंगे कि ,मुस्कुराना क्यों जरूरी है?नाराज हो भी नही सकते हो,तो फिर मुस्कुराने से ही काम चलाओ!

और फिर किन बातों पर कितना नाराज होगे?नदी से रेत खा गए,तो आप भड़क गए,सट्टे, जुए,गांजे,शराब को हर गली तक पहुंचा दिया तो भी आप खफा हो गए,शहर में पार्किंग नही,सड़क पर फुटपाथ खाली नही,तो आप उखड़ गए,जरा सी बुनियादी सुविधाएं समय पर नहीं मिली तो लगे बुदबुदाने!

खाने का तेल थोड़ा सा क्या मंहगा हो गया,तो परेशान होने की क्या बात है,भूल गए दो रुपए पेट्रोल पर कम होने पर मीडिया ने ही तो बताया था,की लोगों में खुशी की लहर है, अब दो रुपए की छूट देकर दस रुपए की लूट को लेकर कब तक यूं उदास बैठे रहोगे,वो देखो सत्ता और व्यापार का गठबंधन तो मुस्कुरा रहा है,उसे देखकर आप भी मुस्कुरा लो,कुटिल मुस्कान में ही सही,रोका किसने है?

ज्यादा टेंशन लोगे तो बीपी हाई हो जाएगा!और भैया जी से लेकर शासन प्रशासन आपसे रूष्ट हो जायेगा!और भैया भगवान को तो रो गिड़गिड़ाकर मना भी लोगे,लेकिन इंसानी शक्ल के पीछे छिपे खूनी भेड़ियों को कैसे मनाओगे?इसलिए भैया भलाई इसी में हैं,मुस्कुराते रहिए, कुछ ना कहिए!

वैसे तो चुप रहना अच्छी बात है!लेकिन जब आपके चुप रहने को मौन स्वीकृति मान लिया जाने लगे तब तो बोलना जरूरी हो जाता है। सवाल करना जरूरी हो जाता है।

जाने दो यार,अपने को क्या लेना देना!अक्सर हम इन लाइनों से दो चार होते ही रहते हैं!जिसके नुकसान भी सामने आते रहते हैं,चुकी अनदेखा करने की आदत इस कदर जकड़ चुकी है की अब अपने ही अधिकारों का अपने सामने हनन होता देखकर भी लोग अनदेखा करना ही बेहतर समझते हैं?

आम जनता की चुप्पी तो राजनीतिक चश्में में सहमति ही है!बेचारी जनता को खुद भी मालूम नही पड़ पाता की उसने स्वीकृति कब दी!फिर चाहे बात भ्रष्टाचार,रिश्वत की हो या फिर गांजे सट्टे की!जनता तो अपना विरोध ही जाहिर करना चाहती है! यह और बात है की कभी डर तो कभी किन्ही अन्य कारणों से यह विरोध खुलकर सामने नही आ पाता है!

यह लोकतंत्र का वह पहलू है,जिसे अक्सर देखकर अनदेखा करना पड़ता है!यहां बात और मांग तो सच की होती है लेकिन सच की जरूरत कहीं दिखाई नहीं पड़ती! जब तक कि बारी खुद की ना आ जाए!

भ्रष्टाचार,रिश्वत,मंहगाई,बेरोजगारी,शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर खामोशी घातक है!शहरों में बढ़ते अपराध और छेड़छाड़ की वजह में भी कहीं न कहीं आम जनता की चुप्पी भी छिपी हुई रहती है!

अभी तो पड़ोसी की लड़की को छेड़ा है,इससे हमें क्या करना!जब हमारी लड़की को कोई छेड़ेगा तब देखेंगे!ऐसी घटिया मानसिकता जब चुप रहने की वजह बन जाए तब भी आप विकास की उम्मीद और बात कर रहे हों!यह कैसे संभव है?

आम जनता जिस सच को खबरों में देखना चाहती है,उसी सच से वह मुंह छिपाए रहती है!किसी के पड़ोस में गांजा बिक रहा है तो किसी के पास सट्टा,जुआ और शराब खोरी का खेल चल रहा है, और कहीं पर देह व्यापार का गंदा बाजार चल रहा है!

फिर भी ये सब चुप हैं!इसे अगर आप डर और चुप्पी नही कहेंगे तो क्या कहेंगे?रिश्वत देने और भ्रष्टाचार को पोषित करने में भी तो आम जनता की खामोशी है ही? डरी हुई जनता आखिर करे भी तो क्या? वह भी तब जब बोलने और सवाल करने का साहस ही ना हो!

आम जनता के भीतर बैठा हुआ डर उसकी चुप्पी में साफ दिखाई देता है! जब सवाल पूछने से भी डर लगने लगे और चुप रहने को अंतिम विकल्प मान लिया जाए,तब यह सोचने की आवश्यकता है की, क्या वाकई हम जिंदा है!क्यों की मुर्दा तो कभी विरोध करते ही नही!लेकिन डर ने सोचने समझने की क्षमता को खोखला कर दिया है!

और यह बड़ी हैरानी की बात है की सबकुछ सामान्य रूप से चल रहा है!क्या यह लोकतंत्र है?जब आप अपने आस पास अन्याय होते हुए देखकर चुप रहते हैं तब आप कहीं न कहीं लोकतंत्र में अपनी भागीदारी खो चुके होते है!

लेकिन इन सबके बीच उम्मीद की बात सिर्फ़ इतनी है कि बहुत से मामलों में लोग अपनी राय रखने लगे हैं,प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगे हैं।

।। विश्लेषण।।

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