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*कैसे पहचाने फर्जी पत्रकार कौन है और वास्तविक पत्रकार कौन?*

।। विश्लेषण।। प्रथम अंक।।

गले या कमर में किसी संस्थान का आईडी, हाथों में माइक और कैमरा/मोबाइल देखकर सहज ही अनुमान लगा लिया जाता है कि, फलां व्यक्ति पत्रकार है!अमूमन तो ऐसा ही होता है!

लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है! वैसे तो ऐसे पत्रकारों की आज भी कमी नहीं है जो ईमानदारी से अपना काम कर रहे हैं! हालाकि इस सबके बीच अक्सर फर्जी पत्रकारों का जिक्र भी आता है! यहां तक कि कई बार अधिकारी से लेकर ग्राम पंचायत के सरपंच सचिव भी कथित तौर पर फर्जी पत्रकारों से त्रस्त हो गए और फर्जी पत्रकारों द्वारा खबर रोकने रुकवाने को लेकर वसूली की खबरें भी देश प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से सामने आई!

ऐसे हालात में सवाल यह उठता है कि,क्या फर्जी और वास्तविक/असली पत्रकार की पहचान की जा सकती है? कैसे पहचाने कि असली कौन है और नकली कौन?आखिर क्या है वो महीन अंतर, जिसे पहचान कर इस तरह की ठगी या अवैध वसूली से बचा जा सकता है? क्या यह पहचान संभव भी है?

यदि आपको असली और नकली के अंतर को पहचानना है तो, इसे थोड़ा गहराई से समझना होगा!चूंकि मसला गंभीर है, इसलिए इसे सीमित शब्दों में बांधना संभव नहीं था, इसलिए इसे गंभीरता पूर्वक पूरा पढ़ना होगा ताकि फर्जी पत्रकार को पहचाना जा सके!

तो आइए आज की इस वार्ता को आगे बढ़ाते हैं - 

प्रिंट मीडिया यानी अखबार से तो आप भलीभांति परिचित होंगे ही।इसके बाद बारी आती है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की और फिर आता है आज के दौर का डिजिटल मीडिया,जिसे भारत सरकार के M.I.B. द्वारा मान्यता देने के लिए अनेक सार्थक और सफल कदम उठाए गए ! आज डिजिटल मीडिया के अनेक पत्रकार अधिमान्य पत्रकार की श्रेणी में भी आ चुके हैं!

अब बारी आती है कि इन सबके बीच फर्जी पत्रकार को कैसे पहचाना जाए? जानिए कुछ खास बातें विस्तार के साथ।

तो आपको हम बता दें कि,पत्रकारिता के भी कुछ नियम कायदे होते हैं, सिर्फ किसी संस्थान से जुड़ जाना ही काफी नही होता!

दरअसल किसी भी पत्रकार या संस्थान को विश्वसनीयता या सम्मान किसी तोहफे में नहीं मिलता है, इसे पत्रकारिता के नीतिशास्त्रीय और नैतिक मानकों का निरंतर पालन करते हुए बनाए रखा जाता है।

कोई भी पत्रकार हो या फिर संस्थान हो पत्रकारिता के सिद्धांतों और मानदंडों का पालन करना चाहिये तथा रिपोर्टों, टिप्पणियों और समग्र कामकाज में पारदर्शित के साथ ही जिम्मेदार होना चाहिये।

आजकल कई बार देखने में आता है कि, स्टिंग ऑपरेशन के नाम पर चोरी छिपे रिकॉर्डिंग कर ली जाती है,और फिर उसे अपने लाभ के लिए आधा प्रस्तुत कर या फिर तोड़ मरोड़कर खबर की तरह दिखाया जाता है!यह कितना सही है? स्टिंग ऑपरेशन के कुछ निगम होते हैं, जिसकी सूचना संबंधित विभाग के उच्च अधिकारियों के साथ साझा करना होती है,और व्यवस्थित रिकॉर्ड रखना होता है!

चोरी से सुनकर या फोटो वीडियो किसी यंत्र का सहारा लेकर या फिर किसी की निजी बातचीत को गुपचुप तरीके से रिकॉर्ड कर अथवा अपनी पहचान को छिपा कर या चालबाजी के साथ सूचना प्राप्त किया जाना उचित नहीं है। हालाकि जनहित के मामले में ऐसा करना उचित है वह भी तब जबकि सूचना प्राप्त करने का कोई और विकल्प न बचा हो! लेकिन ऐसा देखने में कम ही आता है!

इसके बाद अब आपको फर्जी पत्रकार के बारे में समझने में आसानी होगी!

जारी : 

मान लीजिए कि आपके किसी संस्थान,कार्यालय,स्कूल,गांव या फिर पंचायत में कोई शख्स आया जो अपने आपको पत्रकार बता रहा हो!तब ऐसी स्थिति में आपको सबसे पहले तो आपको 




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