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*पत्रकार का दर्द बाटे कौन, , , ?*

क्या इसका जवाब है किसी के पास की,जब पूरा देश और दुनिया झूठ, फरेब, बेईमानी, लूट, भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकी लगा रही हो तो इस बात को कोई ईमानदार पत्रकार कैसे लिखे, कब तक लिखे, कितना लिखे और जान जोखिम में डालकर क्यों लिखे? 

बड़े बड़े मंचों से बातें तो सब बड़ी-बड़ी करते हैं, लेकिन दुनियाभर के दर्द को छापने वाले पत्रकारों का दर्द कौन बांटे?किसे परवाह है पत्रकारों की,समाज को दिशा देने वाले लेखकों की?

आप कभी किसी पत्रकार से पूछिएगा की, कैसे हैं आप? वो पत्रकार मुस्कुराते हुए आपको जवाब देगा कि सब बढ़िया है लेकिन हक़ीक़त यह है कि उसके दिल में कई चीज़ें एक साथ चल रही होती है।दिनभर खबर और स्टोरी के पीछे भागना,समय पर खबर पहुंचाने का दबाव।ऐसा लगता है जैसे कि, इन सब के बीच में उसकी ज़िंदगी और उसके परिवार का कहीं जिक्र नहीं है।

क्या कोई बता पायेगा कि एक स्थानीय पत्रकार कितना कमा लेता है महीने में? क्या उसका निर्धारित वेतनमान भी है कुछ? अच्छा, उसकी दिहाडी कितनी है? आपको जानकर हैरानी होगी कि,उसका वेतन शायद मनरेगा मजदूर के बराबर भी नहीं है!और फिर कोई सरकारी कर्मचारी तो वह है नहीं। फिर किसके लिए इतनी भागदौड़ करता है? समाज के लिए,शोषित और पीड़ित के लिए!

हम यहां बस पत्रकारों की ज़िंदगी पर थोड़ा प्रकाश डालना चाहते हैं।क्यों की अक्सर पत्रकारों के जीवन को लाइम लाइट और पॉलिटिक्स से जोड़कर देखा जाता है,जबकि अधिकतर लोग सिक्के के दूसरे पहलू से अनजान है!

शाजिया निसार अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखती हैं, , , 

तुम क्या समझोगे एक पत्रकार का दर्द..

उसकी तकलीफ़ और उसके जज़्बात.

एक पत्रकार जो चारों पहर मौत के सायं में भी तुम तक ख़बर पहुँचाते-पहुँचाते ख़ुद ख़बर बन जाता हैं.

वो पत्रकार जिसका परिवार उसकी प्रतीक्षा हर पहर करता है

तुम अपने परिवार के साथ हो ख़ुशक़िस्मत हो

शुक्र अदा करो भगवान का

शायद आप यहां उस दर्द और उस खुशी को महसूस कर सकें।आज के दौर में कहीं पत्रकारों का शोषण किया जा रहा है तो कहीं हत्या कर दी जाती है। देशभर में आए दिन ऐसे मामले सामने आते ही रहते हैं।

देखिए यह तो सभी जानते हैं कि,मीडिया के सहारे चर्चित होना सभी चाहते हैं,फिर वो चाहेनेता हो या अधिकारी,सभी मीडिया हेडलाइन/मुख्य पृष्ठ पर आना चाहते हैं। सभी अपने पक्ष की बात करना चाहते हैं और उम्मीद करते हैं कि पत्रकार सिर्फ उनकी अच्छाई ही दिखाए। कितनी हैरानी की बात है की,समाज का हर तबका मीडिया से सिर्फ कवरेज चाहता है!लेकिन यह कभी नहीं जानने की कोशिश करता है कि जिससे मैं कवरेज चाहता हूं उसको तनख्वाह तो मिलती है कि नहीं या उसके घर में चूल्हा जलता भी है कि नहीं?

यदि आप यह सोचते हैं कि,समाचार सेवा प्रदाता कंपनी/मीडिया संस्थान को पर्याप्त डोनेशन मिलता होगा!तो आपको बता दें कि ऐसा नहीं है!क्यों की अक्सर डोनेशन करने वाले भी खबरों को प्रभावित करने का दबाव बनाने की कोशिश करते हैं तो ऐसी स्थिति में अक्सर इस तरह के दानदाताओं से बचने की कोशिश की जाती है,जिसका सीधा असर आर्थिक रूप से दिखाई देता है!

हालात यह है कि, पत्रकार यदि झूठ लिखे तो जनता के हृदय से उतर जाता है और जब सच लिखना चाहे तो अदृश्य ताकतें मार देती हैं। इतने पर भी उसे कायदे से पेट भरने को भी नहीं मिलता और एक खबर पाने के लिए कभी-कभी जान की बाजी लगानी पड़ जाती है।

अक्सर लोग भी पत्रकारों को महज एक हथियार की तरह उपयोग करते हैं,बावजूद इस सबके आज भी पत्रकारों के हितों को प्राथमिकता नहीं दी जा रही है!





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