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*आज़ादी के 77 साल बीत जाने के बाद कितना बदला नरसिंहपुर?*

*हमने यह सवाल अनेकों युवाओं,महिलाओं,छात्राओं और बुजुर्गों से पूछा। तो जानिए नरसिंहपुर शहर के लोगों के नजरिए से नरसिंहपुर को।*

जानकारों के मुताबिक कभी इस शहर का नाम गडरिया खेड़ा था,और रविवारीय बाजार परिसर वह स्थल हैं,जहां अक्सर पिंडारी आकर रुकते थे। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि,नरसिंहपुर में रुकने वाले वही पिंडारी थे, ठग बहराम के नेतृत्व में विंध्याचल से लेकर सह्याद्रि के इलाकों तक जिनकी तूती बोलती थी, कहते हैं कि ये ठग ठगी करने के लिए एक ही रात में पूरी बस्ती और बाजार बसा दिया करते थे,और लोगों को लूटने के बाद पीले कपड़े में सिक्का बांधकर शिकार का गला घोंट कर मौत के घाट उतार देते थे!

खैर तब से लेकर अब तक नरसिंहपुर एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर चुका है और परिवर्तन और विकास की इस यात्रा का सिलसिला अनवरत जारी रहेगा।

जिन लोगों ने 80s और 90s के दशक में नरसिंहपुर को देखा है, वे इस बदलाव को काफी नजदीक से गुजरते हुए महसूस कर रहे होंगे।

इस दौर में अमूमन चारो तरफ ही टूटी फूटी काली और कच्ची सड़कें दिखाई देती थी, बिजली की आंख मिचौली भी रोज की ही बात थी। खैर यह तो अस्सी और नब्बे के दशक की बात है। बड़े पुल से थाने की ओर जाने वाले सड़क गर्मियों के दिनों में सुनसान हो जाया करती थी,दरअसल मुशरान वन में तब बांसों का घना जंगल हुआ करता था, जिसकी वजह से अक्सर लोग इस रास्ते का इस्तेमाल करने से बचते थे।खैर, अब तो वहां मैदान और बस्ती दिखाई देती है।

भाषा से लेकर वेशभूषा में ग्रामीण अंचल की झलक दिखलाई देती थी।शहर दो मुख्य हिस्सों से जाना जाता था, लेकिन बड़े पुल के उस तरफ का हिस्सा पुरानी बस्ती और कंदेली को नई बसाहट के तौर पर पहचाना जाता था।

अस्सी और नब्बे के दशक में नरसिंहपुर कस्बाई जीवन जी रहा था। जिले के ग्रामीण इलाकों की तो आप कल्पना भी नहीं कर सकते है कि, वे किन हालातों का सामना कर रहे थे।सार्वजनिक परिवहन की खस्ता हालत एक आम समस्या थी। नामचीन स्कूलों की फेहरिस्त में सेंट्रल स्कूल और सरस्वती शिशु मंदिर के अलावा दूसरा कोई नहीं था।

हालाकि उस दौर में भले ही बाजार आज की तरह इतने व्यवस्थित नहीं थे,लेकिन दैनिक आवश्यकता की सभी वस्तुएं सहज सुलभ थी। जिला चिकित्सालय की सेवाओं और सुविधाओं में भी विस्तार हुआ है, साथ ही चिकित्सालय भवन का भी कायाकल्प हुआ।

अस्सी और नब्बे के इस दशक के दौर में तकरीबन तीन से चार टॉकीज मोजूद थे,दो रुपए और पांच रुपए से टिकिट की शुरुआत हुआ करती थी। हालाकि आज मोबाइल ने मनोरंजन की दिशा ही बदल दी है,साथ ही मल्टीप्लेक्स और गेमिंग पार्लर आज की युवा पीढ़ी की पसंद है।

इस दौर में नरसिंहपुर एक तरह से संक्रमण काल में था। इस दौरान लोगों के विचारों,जीवन और रहन सहन में आमूल चूल परिवर्तन हुए,इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।

समाजिक कार्यक्रमों पर भी यह बदलाव 90s के दशक के अंत में दिखाई देने लगे थे, तब पंगत भोज और आधुनिक डाइनिंग सिस्टम एक वैचारिक खाई भी खींचने लगे थे,हालाकि यह अधिक सुविधाजनक मालूम होता है।

अस्सी के दशक तक नरसिंहपुर में टेलीविजन सुविधा उपलब्ध नहीं थी,दशक के मध्य में पहली बार नरसिंहपुर में टीवी की आवाज गूंजी थी। तब इस दौर में घर किसी सिनेमा हाल की तरह महसूस हुआ करता था,दरअसल तब सबके पास टीवी नही था, तब घर में टेलीविजन का होना स्टेटस सिंबल था। तब टेलीफोन की सार्वजनिक सुविधा सिर्फ पोस्ट ऑफिस और जिला चिकित्सालय में मोजूद थी, तब मोहल्ले के इक्का दुक्का घरों में फोन हुआ करते थे।

आज बात चाहे शिक्षा के क्षेत्र की हो,या फिर स्वास्थ्य, परिवहन,जीवन शैली,और आचार विचार की हो! स्थितियों में परिवर्तन तो हुआ है, हालाकि अब भी एक बड़े हिस्से तक बुनियादी सुविधाओं को प्राथमिकता से पहुंचाना एक बड़ा मुद्दा है।

जारी : 


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