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विवेचना।

ग्राम पंचायतों से अक्सर गबन,भ्रष्टाचार और हेर फेर की खबरें समाचारों की सुर्खियां बनती रहती है।लेकिन क्या वाकई सरपंच,सचिव और ग्राम रोजगार सहायक ही अनियमितताओं और लापरवाही के लिए दोषी हैं? सुनने में यह सवाल अटपटा जरूर लग सकता है, किंतु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह सवाल बेहद अहम है।

जी नहीं बल्कि अधिकांशतः ऐसे मामलों में प्रशासन की शैली भी उतनी ही जिम्मेदार है जितना कि स्थानीय स्तर पर ग्राम पंचायत।

वैसे तो चर्चाओं में यह भी है की, पंचायत में दिखाई देने वाला भ्रष्टाचार एक प्री प्लान स्कैम है जो ऊपर से ऑपरेटेड है सिर्फ इतना ही नहीं अधिकारी निजी लाभ कमाने के चक्कर में अपने आकाओं के इशारे पर पंचायत से मनमाफिक काम करवाने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाते हैं,इसके लिए मोहरा सरपंच,सचिव और जीआरएस को बनाया जाता है।हालाकि हम इस तरह की खबर की पुष्टि नहीं करते हैं किंतु ऐसी चर्चाओं के वजूद से इंकार भी नही किया जा सकता है।

मनरेगा मजदूरी में हेर फेर और धांधली की खबरें और चर्चाएं भी अक्सर आम जनता के सामने आती रहती है लेकिन मनरेगा मजदूरी में हेर फेर करने के लिए जिम्मेदार महज सरपंच सचिव और जीआरएस है यह कहना पूर्णतः अनुचित होगा। stringer24news की पड़ताल में यह सच निकलकर सामने आया है की मनरेगा मजदूरी में हेर फेर अथवा भ्रष्टाचार अधिकारियों के इशारे पर होता है,हालाकी मामला गरमाने पर अधिकारी अपना पल्ला झाड़ लेते हैं और खमियाजा ग्राम रोजगार सहायक को भुगतना पड़ता है।

stringer24news द्वारा जारी पड़ताल में सच का दूसरा पहलू उजागर हुआ।

कई बार मनरेगा मजदूरी भुगतान में देरी होने पर सचिव और जीआरएस को कई बार गहने गिरवी रखकर भी मजदूरों को भुगतान करना पड़ा है। इतना ही नहीं शासकीय समारोहों/आयोजनों में अधिकारियों और जिम्मेदारों की सेवा करने में चक्कर में सरपंच अपनी बचत पूंजी को भी दांव पर लगा देते हैं किंतु यह ऐसा खर्च है जिसका रिटर्न कई बार नहीं होता है।

नाम ना छापने की शर्त पर अनेक ग्राम रोजगार सहायकों और सचिवों ने यह स्वीकार किया की अधिकारी छोटे से छोटे कार्य की कीमत का आंकलन करते हैं,मसलन आधार कार्ड अपडेट,आयुष्मान कार्ड अपडेट जैसे कामों का भी कमीशन तय करने के लिए समझाइश और निर्देश दिए जाते हैं।

ग्राम रोजगार सहायक और सचिवों का कहना है की अधिकारी यह सोचते हैं की पंचायत में हर काम पर पैसे वसूले जाते हैं और इसी आधार पर विभागों में कार्यवाही में अड़चन पैदा की जाती है ताकि उन्हें भी उनका हिस्सा मिल सके।इससे यह साफ जाहिर होता है कि अधिकारियों के इशारे पर ही सारा खेल चल रहा है।

निजी लाभ के लोभ में महीनो तक अधिकारी फाइलों को लटकाए रहते हैं।

जब भी किसी ग्राम पंचायत से गबन ,भ्रष्टाचार सामने आता है तब बड़ी ही सहजता से सरपंच, सचिव और जीआरएस पर आरोप लगाए जाते हैं! किंतु कभी उच्च अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से सवाल करने की जहमत नहीं उठाई जाती और न ही उन पर आरोप लगाने की हिम्मत जुटाई जाती है।

ग्राम पंचायत भ्रष्टाचार की पहली सीढ़ी अवश्य है किंतु अंतिम नही! उस पर भी विडंबना यह कि पहली सीढ़ी से आगे बढ़ने को न शिकायत कर्ता तैयार होते हैं और ना ही स्थानीय संगठन!

जो पैसा गरीबों के पेट भरने के लिए आवंटित किया गया, वह भ्रष्ट अधिकारियों की तिजोरी में पहुंच गया। हालात इतने बदतर है कि कई जगहों पर तो मिलीभगत से मजदूरों के जॉब कार्ड से राशि की निकासी की गई जबकि अधिकारियों के इशारे के बिना किसी भी सूरत में नहीं हो सकती थी लेकिन बलि का बकरा बनाया गया ग्राम पंचायत पदाधिकारियों को।


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