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ग्रामीण अंचलों में महिला सशक्तिकरण महज एक दिखावा :विवेचना:नरसिंहपुर।

महिला सशक्तिकरण की किस तरह धज्जियां उड़ाई जाती है ग्राम पंचायत बेदू और ग्राम पंचायत रांकई तो इसका एक छोटा सा उदाहरण मात्र है। 

महिला सरपंच को तो जैसे हाशिए पर धकेल दिया गया है और पंचायत को किराने की दुकान समझ लिया गया है!कभी पति कुर्सी पर काबिज तो कभी ससुर और कभी पुत्र!

हालाकी रांकई और बेदू में स्थितियां अलग हैं।यहां हैं तो महिला सरपंच लेकिन उनके पति,ससुर और पुत्र का कुर्सी से कोई लेना देना नहीं है।यहां जीआरएस और सचिव के साथ मिलकर कोई अन्य ही पंचायत चला रहा है! पूजा बलराम (बेदू) और सुनीता ठाकुर (रांकई) जैसी महिलाएं पद का लाभ नहीं उठा पा रही हैं। कैसी विडंबना है कि, पंचायतों में महिलाओं की जगह पुरुष कामकाज देख रहे हैं।

हालाकी ग्राम पंचायत  मालनवाड़ा नारगी और ग्राम पंचायत सुरवारी में सरपंच पति की धाक है।देखने में आ रहा है कि यहां परिजन द्वारा ही सरपंच की भूमिका निभाई जा रही है।ग्रामीणों की माने तो सरपंच पति की मनमानी के चलते गांव में विकास से अधिक अनियमितताएं और लापरवाही बरती जा रही है और महिला सरपंच चौके-चूल्हे में उलझी हुई है।

ग्राम पंचायत बेदू सरपंच पूजा बलराम और रांकई सरपंच सुनीता ठाकुर के मामलों पर गौर करें तो और भी सवाल उठते हैं।मसलन यदि आगामी समय में पंचायत गबन और भ्रष्टाचार में लिप्त पाई जाती है तब ऐसी स्थिति में इन दोनो महिला सरपंचों के समक्ष कौन से विकल्प होंगे? क्या सरपंच अथवा सरपंच पति तक भी पहुंच रहा है गबन की राशि का हिस्सा?

इस तरह की घटनाएं कानून व्यवस्था और प्रशासनिक तंत्र पर कई सवाल खड़े करती है। साथ ही यह पंचायत और विकास में महिलाओं की भागीदारी के संघर्ष को उजागर करती है।

जारी: 

जल्द ही हम आपको बताएंगे कि ग्राम बेदू और रांकई के आंतरिक हालत इतने बदतर होने के बाद भी यथार्थ के धरातल पर किसका विकास 

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