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 किसी भी शहर के समग्र विकास के लिए यह बात बेहद मायने रखती है कि शहर के एक आम नागरिक की वहां के प्रशासनिक और न्याय व्यवस्था के बारे में क्या राय है। हालाकी यह बात अलग है की प्रशासन इस बात को उतनी गंभीरता से नहीं लेता जितना कि इसे लिया जाना चाहिए। 

एक गरीब, बेबस, लाचार, हालात का मारा, तंत्र का सताया हुआ इंसान जब न्याय न मिल पाने की हताशा से घिर जाता है तब समाज में आक्रोश की स्थितियां पैदा होती है। आक्रोश से समाज में अशांति के साथ विकास में भी अवरोध उत्पन्न होता है।धरने प्रदर्शन और आंदोलन आक्रोश व्यक्त करने का ही अहिसात्मक तरीका है।

आज जगह जगह धरने प्रदर्शन और आंदोलन उठ रहे हैं इसका स्पष्ट आशय यह है कि समाज का एक बड़ा वर्ग असंतुष्ट है ,आक्रोशित है,प्रशासनिक और न्याय व्यवस्था के प्रति।बंद एसी कमरों में बैठे जिम्मेदारों को अपनी आवाज सुनाने के लिए एक आम नागरिक को सड़क पर उतरना पड़ रहा है।

आखिर आक्रोश सड़क पर दिखाई भी क्यों न दे,जब लाखों शिकायतें आज भी सरकारी फाइलों में बंद न्याय का इंतजार कर रही हों।सरकार ने आम नागरिक को सहायता और सहूलियत प्रदान करने के लिए तमाम विभाग बनाए उनमें अधिकारी नियुक्त किए,उन्हे तमाम तरह की सुविधाएं दी गई ताकि एक आम नागरिक के मूल अधिकार और बुनियादी जरूरतों को पूरा किया जा सके।

लेकिन कितनी हैरानी की बात हैं की एसी गाड़ी से आकार एसी रूम में बैठने वाले ये जिम्मेदार उसी आम नागरिक के लिए साहब ,सरकार हो गए।अब साहब की मनमर्जी मिलेंगे तो मिलेंगे नही मिलेंगे तो क्या कर लोगे?उनकी मर्जी है भाई ज्यादा चूं चपड करोगे तो न्याय वाली फाइल ऐसी गायब हो जायेगी की ढूंढते रह जाओगे।साहब की मर्जी है भाई!सरकार की मंशा जाए भाड़ में?

सिस्टम में बैठे लोग काम करने की बजाय सिस्टम की कड़ियों को सम्हालने और सुधारने में ही अपना वक्त जाया करते हैं! अब भाई अपने ही लोग हैं सम्हालना तो पड़ता ही है। इस बात का मतलब समझ नही आता है कभी कभी! सिस्टम के लिए उसकी कड़ियां अपनी हैं तो क्या जनता पराई है?यहां बेसिक सवाल तो यही होना चाहिए जिसे सबसे पहले हाशिए पर रख दिया जाता है।

सरकारी तंत्र अगर आम जनता के लिए काम कर रहा है तो यह उसका दायित्व है और आम नागरिक का दायित्व है व्यवस्थाओं का संतुलन बनाए रखना।सबसे पहले तो सिस्टम की इन कड़ियों को आम नागरिक के प्रति हीनता का भाव नहीं रखना चाहिए।आपको जब सर्वोच्च पद पर सेवा के लिए चुना जाता है तब यहां अहम भाव की अपेक्षा सेवा भाव होना चाहिए लेकिन इनके तेवर देखकर तो ऐसा लगता है की बेचारा गरीब किसी क्रूर, निष्ठुर सम्राट के सामने खड़ा हैं, बेबस लाचार!

ग्रामीण समाज की ग़रीबी, शोषण, उत्पीड़न, भेदभाव, महिलाओं की बदहाली जैसे हर मुद्दे पर हमने अपनी कलम से आम जनता की आवाज को बुलंद किया है।

हालाकी मुझ तक कभी कभी इस तरह कि प्रतिक्रियाएं आती हैं कि,इस तरह की विवेचनाएं, समीक्षाएं ना लिखें। हम तो अपना दायित्व निभा रहे हैं,आज stringer24news के सहारे हमने सड़ रही व्यवस्था को समाज में सिर्फ उजागर किया है।

हम जो सवाल उठाते हैं,उसे तो अपने बचाव में सिस्टम की कमजोर कड़ियां नकारात्मक खबर कहकर टालने की कोशिश करती हैं। सिस्टम की इन कमजोर कड़ियों द्वारा वार्ता से बचने के लिए तमाम तरह की बहानेबाजीयों का सहारा लेने से भी गुरेज नहीं किया जाता। सच को छिपाने का दबाव बनाकर अपने दायित्वों से मुक्ति नही पाई जा सकती हैं।

तन्त्र में बैठे लोग और उनके कारिंदे क्या इस कदर संवेदनहीन, विचारहीन, डरपोक, गैरज़िम्मेदार और आत्मकेन्द्रित हो गए हैं की उनके भीतर मानवीयता का भाव भी नष्ट हो गया है?

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