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 जब न्याय व्यवस्था तंत्र के हाथों का खिलौना बन जाए तब आम जनता के सम्पूर्ण विकास की बात बेमानी हो जाती है।अपने निजी हितों के लिए जनता के हितों की बलि चढ़ाया जाना लोकतंत्र नहीं बल्कि पूंजीवाद का प्रतीक मालूम होता है।ऐसे में आप समाजवाद की कल्पना नहीं कर सकते हैं।

अब यहां यह सवाल उठता है की, क्या सारा का सारा सिस्टम ही जनता के हितों को कैश करने में लगा हुआ है।जब योजनाएं जनता के लिए हैं तो फिर विकास कुर्सी पर बैठे चन्द लोगों और तंत्र के कारिंदों की तिजोरियो तक ही क्यों सिमट कर रह गया है?

स्थानीय विभाग से लेकर जिला प्रशासन तक उन राजकुमारों को पंखा झल रहे हैं जो भ्रष्टाचार की राह पर आगे चल रहे हैं!और ऐसा हो भी क्यों न?सिस्टम की कमजोर कड़ियों के कमाऊ पूत जो ठहरे?

यहां न्याय प्रक्रिया एक तमाशे से ज्यादा कुछ नहीं है?सच्चाई फाइलों में दफन है और गरीब के हाथ न रोटी है न कफन है!झूठ बोलने के लिए सिस्टम के लूप होल का फायदा कैसे उठाया जाता है यह तो जिला प्रशासन की कार्यशैली से स्पष्ट हो जाता है।

अधिकारी से लेकर निचले स्तर का कर्मचारी जब खुद यह बोलता हो की ,यहां हिस्सा ऊपर तक पहुंचता है।तब भला आप सोचिए की यहां न्याय कैसे मिलता है?

जब विकास,न्याय,स्वच्छता,कानून व्यवस्था सब कागजों में हो तब एक आम नागरिक जमीनी स्तर पर कैसे जीवन यापन कर रहा है इतना देखने के लिए समय किसके पास है?

वैसे भी अधिकारी तो वही देखते हैं जो उनके कारिंदे कागजों में बताते हैं!सच के पास न्याय की आस है!झूठ को कागजों की तलाश है!फिर भी कहा जाता है की यहां चल रहा विकास है!

धनाढ्य वर्ग के हाथों का खिलौना बना तंत्र किसी गरीब को न्याय नहीं दे सकता है।और वैसे भी यहां तो इस संबंध में कुछ कहावतें हैं जैसे , जिसकी लाठी उसकी भैंस और कानून सिर्फ गरीब के लिए होता है।इन कहावतों के जरिए इंसानी मानसिकता और जमीनी हालात को आसानी से समझा जा सकता है।

कुर्सी पर बैठे जनता के सेवक अमीर और गरीब में फर्क नहीं करते अब यह कहकर बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता है।कुर्सी पर बैठे ये सेवक गरीब को तो इंसान ही मानने के लिए राजी नहीं दिखाई देते!

झूठ की बोली लगाई जाए और सच चौराहों पर नीलाम हो रहा हो तब आप अंतिम पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुंचाने के बाते कैसे कर सकते हैं?व्यवस्था की खामियां यहां भी फिसलन भरी है। यह तन्त्र की शैली का ही नतीजा है की आज गरीब लोगों को हताश होना पड़ता है।

जारी : 

क्या इन परिस्थितियां का कोई हल नहीं? क्यो आज एक आम आदमी न्याय की उम्मीद ही छोड़ देता है?

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