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नरसिंहपुर।
महामारी के बाद युवाओं में तनाव की स्थिति देखी  जा रही है।जिसके फलस्वरूप अनेक अवसाद ग्रस्त युवा नशे का शिकार हो रहे हैं।सरकारी आंकड़ों में भले ही नौकरियों की वृद्धि दिखाई जाती है किंतु वास्तविकता में हालात विपरीत हैं।बेरोजगारी का दंश झेलता हुआ अवसाद ग्रस्त युवा आकंठाओं में डुबकर कभी कभी जाने अनजाने अपराध और भ्रष्टाचार के प्रति आकर्षित हो जाता है।जिसका आधुनिक दौर मे सबसे बेहतर उदाहरण है देश के अनेक हिस्सों से यूट्यूब न्यूज चैनल के माध्यम से अवैध तरीके अख्तियार कर पंचायत और अधिकारियों से अवैध वसूली करना।क्या इसे बेरोजगारी की देन नही कहेंगे।ऐसे ही चिटफंड कंपनियों की फेहरिस्त भी लंबी है।युवाओं की बेरोजगारी का लाभ उठाकर एक ओर जहां स्वार्थी राजनेता इनका दुरुपयोग करते हैं तो वहीं दूसरी और धनी वर्ग भी इनका शोषण करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं।
युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी से समाज का कोई भी वर्ग,धर्म या समाज अछूता नहीं है।आज बेरोजगारी एक आम किंतु विकट समस्या है।भौतिक उपभोग की वस्तुओं के प्रति आकर्षण और उसे पाने की लालसा ने बेरोजगारों को दो राहे पर लाकर छोड़ दिया है।जहां आंखों में सैंकड़ों ख्वाब करवट ले रहे हैं, किंतु बेरोजगारी की कड़वी हकीकत उन्हे शासन की उदासीनता की चरम पराकाष्ठा से अवगत कराती है।ना जाने कितने ही नौजवानो ने आत्म हत्या जैसे घातक कदम उठाकर अपने जीवन की इहलीला का अंत कर दिया।गरीब और निम्न मध्यम वर्गीय बेरोजगार युवाओं की स्थिति तो और भी ज्यादा  खराब है।ना व्यापार करने के लिए पर्याप्त पूंजी है और न ही कोई शासकीय मदद सच तो यह है कि बैंक भी पूंजीपतियों को पूंजी देता है बेरोजगारों को नही।और जिन बेरोजगारों को लोन देने का दावा भी किया जाता है ,उनकी चप्पल घिस जाती है शासकीय कार्यवाही में।तब जाकर मुट्ठी भर युवाओं के आंकड़ों को ऐसे बढ़ चढ़कर बताया जाता है जैसे पूरे देश से ही बेरोजगारी खत्म कर दी गई हो।अवसाद ग्रस्त युवाओं पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।शासन द्वारा पहले से ही जो योजनाएं चलाई जा रही है ,यदि उनका सुचारू और पारदर्शी क्रियान्वयन किया जाने लगे तो सरकार खजाने पर  बिना कोई बोझ डाले बेरोजगारी को बहुत हद तक काबू में कर सकती हैै।
कितने दुर्भाग्य की बात है कि आज भी बेरोजगारों का एक बड़ा वर्ग बेरोजगारी के कारण भूखे पेट सोने और शिक्षा विहीन रहने के लिए विवश है।उनके पास किसी प्रकार की कोई सुविधाएं उपलब्ध नहीं है।
भाई भतीजेवाद और डोनेशन की नीति ने सरकारी नौकरियों पर जो ग्रहण लगाया है इसका दुष्प्रभाव योग्य व्यक्तियों और उनकी योग्यताओं पर पड़ता हैं। नतीजतन कई युवा मजबूर होकर अपने परिवार के लिए अनैतिक कृत्यों में लिप्त हो जाते हैं।
यकीनन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली भी बेरोज़गारी को बढ़ाने में काफी हद तक जिम्मेदार है।
आज का सबसे ज्वलंत सवाल है कि क्या वास्तव में देश बेहतर भविष्य की ओर बढ़ रहा है? किसी देश का भविष्य तभी उन्नति की ओर अग्रसर हो सकता है जब उस देश के युवाओं को बेहतर शिक्षा और शैक्षिक योग्यता के आधार पर रोजगार उपलब्ध हों।लेकिन क्या आज देश में ऐसा हो पा रहा है!शासन की तंद्रा यदि अब भी नहीं टूटी तो आने वाले समय में शासन को युवाओं के आक्रोश का सामना करना पड़ सकता है।जिसका नतीजा आने वाले चुनावों पर गहरा असर डाल सकतें है।
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