ग्राम पंचायत बेदू की यह कहानी किसी डरावनी पटकथा से कम नहीं है, जहाँ लोकतंत्र की साख का सरेआम गला घोंटा जा रहा है। कल्पना कीजिए-मोहर और कुर्सी पर नाम किसी और (महिला सरपंच पूजा) का है, लेकिन उस कुर्सी के पीछे की परछाई किसी और की है!
गजब ड्रामा चल रहा है जनपद गोटेगांव की ग्राम पंचायत बेदू में! सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत क्या हुई, ऐसा लगा मानो भ्रष्टाचार के राजकुमार को बचाने के लिए पूरा सिस्टम ही मैदान में उतर आया हो।
इस पूरे प्रकरण का सबसे खतरनाक और गंभीर पहलू यह है कि जनता द्वारा चुनी गई महिला सरपंच (पूजा) के संवैधानिक अधिकारों और पद की गरिमा का खुलेआम अपहरण कर लिया गया है। ग्रामीणों के गंभीर आरोप हैं कि सरपंच साहिबा के नाम पर आने वाले सभी शासकीय ओटीपी (OTP), डिजिटल पासवर्ड और प्रशासनिक फैसले उनके पति बलराम द्वारा चलाए जा रहे हैं।
जब जनता किसी शासकीय काम के लिए फोन करती है, तो सरपंच का फोन उनके पति के हाथ में मिलता है-सवाल यह है कि क्या सरकारी कागजों पर महिला आरक्षण सिर्फ एक मुखौटा है, और असली हुकूमत पर्दे के पीछे से 'सरपति' (सरपंच पति) चला रहे हैं?
शासकीय फाइलों, गुप्त पासवर्ड्स और डिजिटल ओटीपी (OTP) का यह कैसा खौफनाक अपहरण है, जहाँ चुने हुए नुमाइंदे सिर्फ कागजी कठपुतली बनकर रह गए हैं और असली 'मालिक' बनकर पति (बलराम) पर्दे के पीछे से पूरा सिस्टम कंट्रोल कर रहा है?
ग्रामीणों के अनुसार, बुधवार को जांच दल जब ग्राम पंचायत बेदू पहुंचा, तो उसकी कार्यप्रणाली को लेकर असंतोष फैल गया।
पंचायत स्तर पर हो रही कथित अनियमितताओं के मामलों में निष्पक्ष जांच करने के बजाय, अधिकारियों का रुख लीपापोती करने और पक्षकारों को बचाने वाला प्रतीत हो रहा है।
शिकायतकर्ता गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं (लिवर में सूजन और एक्सीडेंट) के चलते बिस्तर पर है और चल-फिर नहीं सकता। क्या जांच दल को यह नहीं पता था कि शिकायतकर्ता के बयान के बिना जांच अधूरी है? फिर इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई गई?
जब शिकायतकर्ता खुद अपना पक्ष रखने में असमर्थ था, तो बिना उसका पक्ष सुने जांच कैसे पूरी मान ली गई? क्या जांच अधिकारी भी इस मिलीभगत में शामिल हैं?
अब आप पूछेंगे कि इसमें नया क्या है? नया यह है कि जब भ्रष्टाचार की इस फाइल पर उंगली उठी, तो जांच दल को फौरन हरकत में आ जाना चाहिए था। लेकिन जांच दल का रवैया देखकर ऐसा लगा कि मानो वे सच की तलाश में नहीं, बल्कि महोदय और महोदया को 'क्लीन चिट' का सर्टिफिकेट बांटने निकले हों!
क्या एक बीमार नागरिक की लाचारी का फायदा उठाकर फाइलों पर पर्दा डाल देना ही आज के प्रशासनिक सिस्टम का नया दस्तूर बन चुका है?
गांव के लोग पूछ रहे हैं, और हमें भी यह सवाल पूछना चाहिए कि, क्या जांच अधिकारी भी इस पूरी मिलीभगत का एक हिस्सा हैं?
