आज हमें यह समझने की जरूरत है की दिव्यांगो का जीवन भी हमारी तरह है। वे अपनी कमज़ोरियों पर विजय पाकर हमारे साथ चलने का जज्बा रखते हैं। बस उन्हें प्रेरणा की आवश्यकता है।
दिव्यांगो के आत्म-सम्मान और जीवन को नई दिशा देने के उद्देश्य से कई योजनाओं एवं रियायतों की घोषणा की जाती है, जिसमें 'निःशक्त व्यक्ति अधिकार विधेयक, 2016' प्रमुख है।किंतु ऐसा लगता है यह अधिकार सिर्फ कागजों में सिमटकर रह गए हैं ।
प्रतिवर्ष की भांति विश्व विकलांग दिवस 03 दिसंबर पर महज मेले,खेल कूद और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित कर जिम्मेदार अपने कर्तव्यों से इति श्री कर लेते हैं।तस्वीरें छपवाई जाती है, वाह वाही बटोरी जाती है किंतु इन सबके बावजूद दिव्यांगो के उत्थान और अधिकारों की बातें महज बातें बनकर रह जाती हैं।
आज भी दिव्यांगो को हीन भावना से देखा जाता है,उनका मजाक बनाया जाता है।समाज में उन्हें वह स्थान आज भी नही दिया जाता है जिसके वे अधिकारी हैं। हालात यह है की आज भी अधिकतर लोग यह नहीं जानते हैं कि उनके आसपास में कितने दिव्यांग लोग हैं।इस सवाल को भी भुला दिया जाता है की समाज में उन्हें उनके अधिकार मिल रहे हैं या नहीं।वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह बात भी समझ से परे है की विश्व विकलांग दिवस, दिव्यांगो के प्रति करुणा, आत्म-सम्मान और उनके जीवन को बेहतर बनाने के समर्थन के उद्देश्य से मनाया जाता है या फिर शोहरत और वाहवाही बटोरने के उद्देश्य से।आज जरूरत है दिव्यांगो के प्रति सामान्य नागरिकों की तरह उनकी सेहत पर ध्यान देने के साथ सामाजिक-आर्थिक स्थिति को सुधारने पर ध्यान केंद्रित करने की।अच्छी सेहत और सम्मान पाने के लिये तथा जीवन में आगे बढ़ने के लिये दिव्यांगो को सामान्य लोगों से कुछ सहायता की अपेक्षा जरूर है, लेकिन, आमतौर पर समाज में उनकी ज़रुरतों को समझा ही नहीं जाता हैं।यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि आज दिव्यांगो विश्व का एक बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग हैं और उनके लिये उचित संसाधनों और अधिकारों की कमी के कारण जीवन के सभी पहलुओं में दिव्यांगो को ढ़ेर सारी बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।
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