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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

एक तरफ भाई 'सप्लायर' तो दूसरी तरफ परिवार 'ठेकेदार', इकलौद पंचायत का काला चिट्ठा?

आज हम आपको मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के सिरोंज जनपद ले चलते हैं। वहाँ एक ग्राम पंचायत है "इकलौद"। इस पंचायत की कहानी सुनेंगे तो आपको लगेगा कि अर्थशास्त्र की सारी किताबें, संविधान के सारे अनुच्छेद और शासन के तमाम कायदे-कानून दरअसल एक भ्रम हैं।

असली सच तो यह है कि लोकतंत्र में भी एक 'पारिवारिक प्राइवेट लिमिटेड' चलाई जा सकती है, जहाँ मालिक भी आप, मजदूर भी आप, सप्लायर भी आप और कानून को डराने वाले ठेकेदार भी आप!

जरा सोच कर देखिए... एक ही इंसान सुबह-सुबह फावड़ा लेकर खुद को सबसे गरीब मजदूर साबित करता है, और दोपहर होते-होते 'सप्लायर' के सूट-बूट में बैठकर भारी-भरकम बिल पास करा लेता है। जनपद सिरोंज के अधिकारियों से कोई पूछे कि भाई, यह कौन सी थ्योरी है? क्या अर्थशास्त्र की किसी यूनिवर्सिटी में ऐसा कोई पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है जहाँ एक ही व्यक्ति मजदूर भी हो और उसी योजना का ठेकेदार भी? यह तो गजब का हुनर है! दोनों हाथों से लड्डू खाने की इससे बेहतरीन मिसाल पूरी दुनिया में नहीं मिलेगी।

यहाँ के एक करिश्माई शख्स हैं, सुरजीत, जो सरपंच साहब के भाई बताए जाते हैं। सुरजीत साहब की बहुमुखी प्रतिभा का लोहा पूरा इलाका मानता है। एक तरफ जनाब कागजों पर 'गरीब मनरेगा मजदूर' बनकर मजदूरी का पैसा अपनी जेब में डालते हैं, और दूसरी तरफ 'सुरजीत ट्रेड्स' के नाम से बड़े-बड़े फर्ज़ी बिल पेश करके सरकारी खजाने से लाखों रुपये डकार जाते हैं।

इस पंचायत के ग्राम रोजगार सहायक महोदय ने तो अपने परिवार के नाम पर एक पूरा का पूरा सरकारी लघु उद्योग खड़ा कर दिया है। भई, उन्होंने अपनी धर्मपत्नी जो खुद एक 'आंगनवाड़ी कार्यकर्ता' हैं, को किसी दूसरे के जॉब कार्ड में फिट कर दिया। उनकी फोटो बदली, बैंक खाता जोड़ा और चुपचाप लाखों रुपये घर पहुँचा दिए।

इस पंचायत के एक और 'चमत्कारी किरदार' पर, जिनका नाम है—राकेश अहिरवार।

जॉब कार्ड सूची गवाह है कि राकेश अहिरवार जी कागजों पर नियमित रूप से मनरेगा मजदूर बने हुए हैं। वे मजदूरी का हर हक वसूल रहे हैं। लेकिन इनकी बहुमुखी प्रतिभा यहीं नहीं रुकती। एक तरफ तो जनाब मजदूर बनकर पसीना बहाने का दावा करते हैं, और दूसरी तरफ इनके नाम पर 23 फर्जी बिल लगाकर 4,99,200 रुपये (लगभग पांच लाख रुपये) सीधे डकार लिए जाते हैं!

ग्रामीणों की जुबानी और अब सामने आए दस्तावेजों से एक ऐसा सनसनीखेज सच बाहर आया है, जिसे सुनकर किसी की भी रूह कांप जाए। ग्रामीणों का साफ कहना है कि राकेश ने मनरेगा और फर्जी बिलों से बटोरे गए इसी अवैध पैसे से अपनी पत्नी के नाम पर जमीन खरीद ली है! वाह रे व्यवस्था! मजदूरी मनरेगा की, बिल फर्जीवाड़े के, और ऐश-ओ-आराम से जमीन की खरीद-फरोख्त किसी प्राइवेट लिमिटेड के मालिक की तरह! क्या मनरेगा योजना गरीबों का पेट भरने के लिए थी या इन शातिर किरदारों की जमीनों का साम्राज्य खड़ा करने के लिए?

भाई, बेटी, माँ... सब इस पारिवारिक सहकारिता में शामिल हैं। कोई कहीं सप्लायर है, तो कोई कहीं ठेकेदार। जनता सोचती रह जाती है कि हम किस देश में जी रहे हैं, जहाँ सरकारी योजनाएं जनता के कल्याण के लिए नहीं, बल्कि कुछ खास परिवारों के वंश वृक्ष को सींचने के लिए आती हैं।

और हाँ, अगर इस पूरी लूट-खसोट के बीच कोई गरीब मजदूर, कोई बेबस इंसान अपनी सुखी हुई जुबान से यह पूछने की जुर्रत कर ले कि, 'भाई, हमारा हक कहाँ है? हमारे हिस्से का काम और पैसा कहाँ जा रहा है?', तो उसे तुरंत 'धमकी की होम डिलीवरी' मिल जाती है। दफ्तरों से लेकर गलियों तक बस एक ही संदेश गूंजता है—'आवाज उठाई तो नतीजा बुरा होगा!'

अब सवाल यह है कि सिरोंज जनपद और विदिशा जिला मुख्यालय पर बैठे जिम्मेदार अधिकारी क्या कर रहे हैं? क्या वे सचमुच अंधे हैं, या फिर इस फाइल पर भी किसी गुप्त समझौते की धूल जम चुकी है?

सोचिए... एक तरफ वह मजदूर है जो धूप में जल रहा है, और दूसरी तरफ यह पारिवारिक साम्राज्य है जो सरकारी तिजोरी को चट कर रहा है।

बाकी, आप खुद समझदार हैं। इकलौद के इन साहबों को गरीब माना जाए या इस देश की व्यवस्था का सबसे बड़ा सप्लायर? फैसला आपके हाथ में है।

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