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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

'नागिन डांस' और 'दबंगई' का खतरनाक कॉकटेल!(गोली चलाना तो हमारा शौक़ है ...)

आज बात करेंगे एक ऐसी 'खुशी' की, जिसके साये में खौफ पलता है। बात करेंगे उस व्यवस्था की, जो या तो सो रही है या फिर आँखें मूंदकर किसी बड़े हादसे का इंतज़ार कर रही है।

जनाब महिलाओं के बीच में ऐसे थिरक रहे थे, मानो कह रहे हों— "गोली चलाना तो हमारा शौक़ है और डर पैदा करना हमारी स्टाइल!"

एक शादी का माहौल है। शादियां इस देश में उत्सव होती हैं, मिलन का अवसर होती हैं। लेकिन उसी शादी में एक सज्जन हैं, जिनका नाम विकास विश्वकर्मा (ग्राम खेजड़ा) है। विकास जी महिलाओं के साथ नाच रहे हैं। नाचते-नाचते वो हवा में शस्त्र लहरा रहे हैं। ग्रामीणों की गवाही के मुताबिक, इस दौरान 'हर्ष फायरिंग' भी होती है। यानी जश्न के नाम पर आसमान में बारूद का धुआं उड़ाया जाता है।

तारीख है 4 फरवरी 2026। जगह है,मध्य प्रदेश के विदिशा जिले का पठारी क्षेत्र।दूल्हा ऋतिक विश्वकर्मा भी दुल्हन के साथ फायरिंग करता हुआ दिखाई दे रहा है!

अब ज़रा सोच कर देखिए। उस भीड़ में महिलाएं थीं, बच्चे थे, बुजुर्ग थे। ज़रा सी चूक, बंदूक की एक गलत नली, या ज़रा सा फिसल, और वो खुशी उसी पल मातम में बदल सकती थी। गनीमत ये रही कि उस दिन कोई गंभीर दुर्घटना नहीं हुई। कोई गोली किसी बेकसूर को नहीं लगी। लेकिन क्या 'दुर्घटना न होना' इस बात का लाइसेंस बन जाता है कि आप कानून की धज्जियां उड़ाते रहें? क्या लापरवाही का यह नंगा नाच यूं ही चलता रहेगा?

ग्रामीण डरे हुए थे। डरना लाजिमी भी है। जब कोई आदमी डीजे की धुन पर हथियार लहराएगा, तो लोग जश्न मनाएंगे या अपनी जान बचाएंगे?

गांव के लोग कानून के पास गए। वे जिला कलेक्टर के पास पहुंचे। उन्होंने कहा— साहब, देखिए। इस आदमी के पास शस्त्र का लाइसेंस है, लेकिन यह इसका दुरुपयोग कर रहा है। इसके हथियार का लाइसेंस रद्द कीजिए। एक फरियाद की, गुहार लगाई।

लेकिन फाइलें कहां चलती हैं? कलेक्टर साहब की टेबल पर शायद वो अर्जी किसी ठंडे बस्ते में दबी रह गई। कोई उचित कार्रवाई नहीं हुई। कोई हलचल नहीं हुई।

यहाँ सवाल उस व्यक्ति से नहीं है, जो नाचते हुए बंदूक लहरा रहा था। सवाल उस सिस्टम से है, जो सब कुछ जानने के बावजूद तमाशबीन बना बैठा है। क्या प्रशासन किसी अनहोनी के होने का इंतज़ार कर रहा है? क्या जब तक कोई लाश नहीं गिरती, तब तक फाइल पर धूल ही जमी रहेगी?

हर्ष फायरिंग कोई 'शौक' नहीं है, यह आपराधिक लापरवाही है। और जब प्रशासन ऐसे मामलों में खामोश हो जाता है, तो वह इस लापरवाही का हिस्सेदार बन जाता है।

ये कौन सा शौक है जिसमें ख़ुशी के आंसू की जगह लोगों की जान हलक में अटक जाए? क्या शादी-ब्याह अब हथियारों के प्रदर्शन का अखाड़ा बन गए हैं?

सोचिए इस बारे में। और खुद से पूछिए कि क्या हम ऐसे समाज में रहना चाहते हैं जहाँ शादियां गोलियों की गड़गड़ाहट से पहचानी जाएं?

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