उन्होंने सोचा भूखा रहेगा तो लिखना छोड़ देगा!
लोग कहते हैं कि यह घाटे का सौदा है, बेवकूफी है।
आजकल कोई भी मिलता है तो बड़ी सुहानूभूति जताते हुए पूछता है- "अरे भाईसाहब! आजकल कलम से भी कोई कमाई होती है क्या? कौन पढ़ता है आज के दौर में? लोग तो आधे-आधे मिनट की रील्स और शॉर्ट्स के नशे में हैं। किसी के पास फुर्सत है कि आपके दो पन्ने का लेख पढ़े? छोड़िए इन सब बातों को, इस लाइन में कुछ नहीं रखा है।"
बात सुनने में बिल्कुल सही लगती है। बाजार के लिहाज से सोचिए तो एकदम घाटे का सौदा है। इस देश में रील पर नाचने वालों के फॉलोअर्स करोड़ों में हैं, उनके वीडियो पर लाइक्स की बाढ़ है। ऐसे में अगर कोई बैठ कर लोकतंत्र, संविधान, भूख, गरीबी या व्यवस्था की सड़न पर लिख रहा है, तो बाजार उसे पागल ही कहेगा न?
लेकिन क्या करें? लिखना मेरा कोई 'शौक' नहीं है। न ही यह कोई ऐतराज या मजबूरी में किया गया काम है। यह मेरी सांसों की रफ़्तार है, यह मेरी जिंदगी है!
अब आप पूछेंगे कि भई, जब बाजार में डिमांड ही नहीं है, तो फिर खर्चा-पानी कैसे चलता है?
मैंने सच लिखने की बहुत भारी कीमत चुकाई है। जैसे ही मैंने सत्ता के दरबार में हाजिरी लगाने से मना किया, विज्ञापनों के दरवाजे अपने आप बंद हो गए।
सत्ता के गलियारों से, महकमों के आलीशान दफ्तरों से और सरकारी तिजोरियों से पूछिए— क्या कभी मुझे कोई विज्ञापन मिला? नहीं!
क्योंकि मैंने उनकी चाटुकारिता करने से इंकार कर दिया। मैंने उनके भ्रष्टाचार के दस्तावेज उजागर किए, तो उन्होंने मेरे रास्ते के सारे विज्ञापन बंद करवा दिए।
वे मुझे विज्ञापनों के भूखे भेड़ियों के आगे तोड़ना चाहते थे, झुकाना चाहते थे। उन्हें लगा कि भूखा रख देंगे तो कलम खुद-ब-खुद घुटने टेक देगी।
सरकारी महकमों से आने वाले उन विज्ञापनों के लिफाफे, जिन पर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को पालने का भ्रम पाला जाता है, वो मेरे पास आने बंद हो गए।
लेकिन उन्हें कौन समझाए कि जमीर की स्याही से चलने वाली कलम, विज्ञापनों के मोहताज नहीं होती।
हाँ, सच है कि मुझे सत्ता से कोई विज्ञापन नहीं मिलता। फेसबुक से थोड़ा-बहुत मिल जाता है, थोड़ा वेबसाइट के विज़िटर्स से आ जाता है, और बाकी... बाकी इस देश के वे आम, सहृदय पाठक और शुभचिंतक हैं, जो अपनी जेब से थोड़ा-थोड़ा सहयोग करके इस दीये को बुझने नहीं देते।
वे लोग जो खुद मध्यम वर्ग से हैं, संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन वे जानते हैं कि अगर यह आवाज़ भी बंद हो गई, तो चारों तरफ़ सिर्फ़ एक ख़ामोशी रह जाएगी— और उस ख़ामोशी से बड़ा डर दुनिया में कुछ नहीं होता।
जब तक इस देश में किसानों के आंसू अनसुने किए जाएंगे, जब तक बेरोजगारों की डिग्रियां चाय की थड़ियों पर धूल फांकती रहेंगी और जब तक सत्ता के गलियारों में सवाल पूछने पर देशद्रोह का ठप्पा लगेगा— तब तक यह कलम चलती रहेगी।
चाहे कोई रील्स देखे या न देखे, चाहे कोई फेसबुक पर लाइक करे या न करे... लिखना मेरी मज़बूरी नहीं, मेरी आज़ादी है!
शौक के लिए लिखना आसान होता है, मजबूरी में लिखना घुटन भरा, लेकिन जब लिखना आपकी ‘अस्तित्व की लड़ाई’ बन जाए, तो फिर न कोई डर रहता है और न ही किसी सौदेबाजी की गुंजाइश!
मैं यह कभी नहीं कहूँगा कि आप मेरी मदद कीजिए। क्यों कि आपको यह महसूस होना चाहिए कि आप मुझे नहीं, बल्कि इस अकेली पड़ती हुई कलम को बचा रहे हैं। और अगर आपका जमीर गवाही देता है कि इस दौर में एक कलम को बचाकर किसी सच्चे पत्रकार को ज़िंदा रखना चाहिए, तो आप मुझसे संपर्क कर सकते हैं। यह किसी के आगे हाथ फैलाना या कोई भीख नहीं है, और न ही यह मुझ पर कोई उपकार है— यह सीधे तौर पर 'सच का साथ' है, अगर आप अपनी मर्ज़ी से इसका हिस्सा बनना चाहें तो आपका स्वागत है।
