गोटेगांव में पत्रकारों का भाव तय हो गया है?(सिलारी-सिलवानी - कोरेगांव स्पेशल: खबर दबाओ, विज्ञापन पाओ!)
बड़ा सवाल यह है कि, जब आप इन अखबारों या पोर्टल्स को इंटरनेट पर खंगालेंगे, तो नरसिंहपुर जिले या गोटेगांव क्षेत्र का दूर-दूर तक कोई वजूद, कोई जमीनी कवरेज, कोई रिपोर्टिंग नहीं मिलेगी! फिर किस हक से, किस सर्कुलेशन के आधार पर इन संस्थानों को जनता की गाढ़ी कमाई से विज्ञापनों का भुगतान किया जा रहा है?
गोटेगांव जनपद की ग्राम पंचायत सिलारी और सिलवानी में इस राष्ट्रीय पर्व की आड़ में क्या खेल चल रहा है?
क्या गोटेगांव के तथाकथित 'पत्रकार' अब सिर्फ स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाओं के विज्ञापनों पर बिक चुके हैं? या फिर जनहित के मुद्दों को दबाने का यह एक नया और सुरक्षित फॉर्मूला तैयार हो चुका है?
जरा गौर से देखिए इन दो बिलों को!
दैनिक 'रुद्रांश दर्पण' (बिल क्रमांक B-184, दिनांक 16-08-2026) के माध्यम से ₹2,100/- और 'श्रेष्ठ न्यूज' (बिल नं. 179, दिनांक 16-08-2026) के माध्यम से ₹3,000/- का भुगतान "स्वतंत्रता दिवस शुभकामना संदेश" के नाम पर सीधे पंचायत के खातों से काटा गया है।
सवाल यह नहीं है कि ये अखबार कहां छपते हैं या इनका दफ्तर कहां है?
सवाल यह है कि जो इलाका इन अखबारों के पन्नों पर कभी नज़र ही नहीं आता, वहां की जनता के खून-पसीने के टैक्स के पैसों से इन तथाकथित कागजी संस्थानों को हजारों-हजार रुपए के चेक और बिल क्यों बांटे जा रहे हैं?
क्या यही वो 'पत्रकारिता' है, जिसके दम पर गांवों में हो रहे भ्रष्टाचार, घटिया निर्माण कार्यों और पंचायत घोटालों पर हमेशा के लिए पर्दा डाल दिया जाता है?
गोटेगांव तहसील की ग्राम पंचायत सिलवानी का खेल भी कुछ ऐसा ही है, जहां कागजों पर 'चंदन सिंह लोधी' के नाम से 5वें वित्त आयोग (5th FC) की मद से नाली सफाई, गाड़ी-घोड़ा परिवहन और हैंडपंप सुधार जैसे विभिन्न कार्यों के नाम पर हजारों रुपये के वाउचर (EPO Number: 3912369) काटकर धड़ल्ले से राशि आहरित की जा रही है।
ग्राम पंचायत कोरेगांव का खेल भी कुछ ऐसा ही है, जहाँ नियमों को ताक पर रखकर 'चंदन सिंह लोधी' को कभी 'दुकानदार' तो कभी 'जनसामान्य' बताकर धड़ल्ले से भुगतान किया जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि एक ही व्यक्ति को अलग-अलग मदों और रूपों में पंचायत से लगातार राशि जारी हो रही है,
लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि इस तरह के तमाम फर्जी और संदेहास्पद भुगतानों के बावजूद स्थानीय स्तर पर कोई आवाज क्यों नहीं उठती?
दरअसल, इन पंचायतों में मनमाने तरीके से हो रहे वित्तीय घालमेल पर पर्दा डालने और अपनी जुबान बंद रखने के एवज में तथाकथित पत्रकारों को इस तरह विज्ञापनों और भुगतानों से उपकृत कर दिया जाता है, ताकि भ्रष्टाचार का यह खेल बेरोकटोक चलता रहे।
जब पंचायत से इस तरह के फर्जी और बिना कवरेज वाले विज्ञापनों के नाम पर पैसों की रेवड़ियां बटेंगी, तो भला कौन सा कलमकार इन भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत करेगा?
जब तक मैदान पर सच दिखाने वाले सच्चे पत्रकारों को कुचला जाएगा और इस तरह के "कागजी विज्ञापनों" से गानों-बजानों का भुगतान होता रहेगा, तब तक ग्रामीण विकास कागजों पर ही दम तोड़ता रहेगा।
पत्रकारिता का मतलब था सत्ता से सवाल पूछना। लेकिन जब सत्ता ही विज्ञापनों और बिलों के जरिए कलम को खरीद लेगी, तो फिर लोकतंत्र में जनता का पहरेदार कौन बचेगा?
