जब सदर की महारानी के दरबार में थम गया हर दर्शक का दिल! नरसिंहपुर
नवरात्रि के इन पावन दिनों में भक्ति का रंग किस कदर परवान चढ़ रहा है, इसकी एक बानगी कल सदर की महारानी के प्रांगण में देखने को मिली। जब माहौल पूरी तरह माँ की आराधना में डूबा था, तभी एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने वहाँ मौजूद हर शख्स का दिल झूमने पर मजबूर कर दिया।
मानो ऐसा प्रतीत हो रहा था कि साक्षात देवकन्याएं स्वर्ग से उतरकर जगत जननी माँ अम्बे के चरणों में अपनी कला की हाजिरी लगा रही हों। उनके चेहरों की मासूमियत, घुंघरुओं की झंकार और ताल से ताल मिलाते उनके नन्हे पाँव, यह सिर्फ एक नृत्य नहीं था, बल्कि साक्षात भक्ति और श्रद्धा का जीवंत दस्तावेज था।
जब इन फूल जैसी बच्चियों ने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच घूम-घूमकर गरबा किया, तो वहाँ मौजूद हर माँ-बाप और बुजुर्ग की आँखें गर्व से छलक उठीं। यह पल सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि हमारी सनातन संस्कृति की अमूल्य थाती का भविष्य है।
यह कोई टीआरपी वाला तमाशा नहीं है। यह स्क्रीन पर चमकने वाली किसी ब्रेकिंग न्यूज़ की हेडलाइन भी नहीं है। यह उससे बहुत ऊपर, बहुत बारीक और हमारे समाज के उस कोने की कहानी है, जहाँ अब भी सादगी जिंदा है।
उनके चेहरे पर वो कृत्रिम चमक नहीं थी जो विज्ञापनों में बेची जाती है। उनके चेहरों पर वो निर्मल मुस्कान थी, जो सिर्फ तब होती है जब बच्चा अपनी माँ की गोद में होता है। जब वे गोल-गोल घूम रही थीं, तो ऐसा लग रहा था मानो सदियों पुरानी परंपरा, हमारे पुरखों का वो विश्वास, किसी भारी-भरकम फाइल में बंद होने के बजाय इन मासूमों की पाँवों की थिरकन में सांस ले रहा हो।
जो लोग कल सदर की महारानी के दरबार में थे, वे भाग्यशाली हैं कि उन्होंने इस दौर में भी कुछ ऐसा देख लिया, जो दिल को हल्का कर देता है, आँखों को नम कर देता है और चेहरे पर एक सच्ची मुस्कान छोड़ जाता है।
माँ जगदम्बा से यही प्रार्थना है कि हमारी इन नन्ही बालिकाओं पर अपनी छत्रछाया और कृपा सदा बनाए रखें तथा हमारे संपूर्ण नगर में सुख, समृद्धि और शांति का वास हो।










