शोभेंद्र शर्मा गोटेगांव के 'डिजिटल डाकू'? जमुनिया ग्राम पंचायत
नरसिंहपुर के गोटेगांव में तो वो हाल हो गया है कि "अंधेर नगरी, चौपट राजा, टके शेर भाजी, टके शेर खाजा!"
यहाँ ग्राम पंचायतों में विकास हुआ हो या न हुआ हो, लेकिन दलाली का ऐसा रंग चढ़ा है कि "माल-ए-मुफ़्त, दिल-ए-बेरहम!" पंचायत का बजट देखकर दलालों की बांछें खिल गई हैं और वे सोच रहे हैं—"राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट!"
ज़रा जमुनिया पंचायत में एक बार फिर शोभेंद्र शर्मा के हुनर को तो देखिए! शोभेंद्र कभी 'लघु दुकानदार' का मुकुट पहन लेते हैं, तो कभी 'प्राइवेट फर्म' के डायरेक्टर बन बैठते हैं। इसे कहते हैं—"अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता! पंचायतों में तो वही कहावत सच साबित हो रही है कि "काज न काम का, दुश्मन अनाज का!"
गोटेगांव की ही एक और पंचायत है—कापखेड़ा। वहाँ क्या हुआ? वहाँ कागज़ों पर शोभेंद्र शर्मा को मजदूर बना दिया। असली मजदूर बेचारा सुबह से शाम तक धूप में पसीना बहाता है, उसे मजदूरी के लाले पड़े रहते हैं, और कागज़ों पर ‘डिजिटल मजदूर’ इतनी तेजी से काम करते हैं कि पंचायत का खजाना खाली हो जाता है। इसे आप क्या कहेंगे? क्या यह वही ‘ग्राम स्वराज’ है जिसके सपने देखे गए थे?
पर जनाब, दोष सिर्फ कापखेड़ा या जमुनिया का थोड़ी है। चंदली, टिकरी, रोहिया और मवई पंचायतों में भी विकास की गंगा नहीं, बल्कि "फर्जी बिलों की बानगंगा" ऐसी बही है कि रिकॉर्ड रूम भी गोते खाने लगा है।
अब इसमें रॉकेट साइंस समझने की क्या जरूरत है कि हमारे माननीय जनपद और जिला पंचायत के अधिकारी अपनी आँखें क्यों मूंदकर बैठे हैं? अरे, भई! आँखें खुली रखने से तो धूल जाती है, और यहाँ तो "कमीशन का चश्मा" इतना मजबूत है कि बिना पारदर्शी लेंस के कुछ दिखता ही नहीं है!
तो सोचिए, क्या वाकई हमारा लोकतंत्र अब इतना कमज़ोर हो चुका है कि कुछ पन्नों के फर्जी बिल और चंद दलाल मिलकर पूरी व्यवस्था को हाईजैक कर लें?
गज़ब का विविधीकरण है। आदमी छोटा दुकानदार भी है और प्राइवेट फर्म भी। और मजे की बात यह है कि बिल दोनों हैसियत से पास हो जाते हैं।
इस देश में भगवान ने सबको एक ही दिमाग दिया है, लेकिन कुछ लोगों का दिमाग ऐसा होता है कि वो पंचायत के बजट को देखकर तुरंत फर्म में बदल जाता है।
आखिर जिला पंचायत के अधिकारियों के मुंह में दही जमा है या फिर मलाई ने इनकी जुबान पर ताले जड़ दिए हैं?
गोटेगांव से लेकर पूरे नरसिंहपुर तक पंचायतों में लूट का खेल चल रहा है, कागजों पर फर्जी बिलों के पहाड़ खड़े हो रहे हैं, और हमारे नुमाइंदे ऐसे आंखें मूंदकर बैठे हैं मानो वे कुंभकरण के खानदान से ताल्लुक रखते हों!
जब तक जनता का खून चूसने वाले इन दलालों और भ्रष्ट तंत्र की मिलीभगत की पोल नहीं खुलेगी, तब तक ये साहबान अपनी एसी कुर्सियों से बाहर झांकेंगे भी नहीं।
सवाल यह नहीं है कि अधिकारी अंधे क्यों हैं? अब सवाल यह है कि इस मलाईदार खेल में इन "ऊपर बैठे मसीहाओं" का कितना प्रतिशत हिस्सा तय है?
