गोटेगांव में शुभेंद्र शर्मा महिला सरपंच पर कौन सा जादू कर देता है?(महिला सरपंचों के साथ..'विशेष संबंध' या..गोटेगांव के दूसरे दुकानदारों से क्या दुश्मनी है?)
आज हम गोटेगांव की ओर रुख कर रहे हैं। नक्शे पर देखिए, मध्य प्रदेश का गोटेगांव। वहां कुछ ग्राम पंचायतें हैं—चंदली, मवई, टिकरी और रोहिया। इन पंचायतों में एक बहुत ही अद्भुत और करिश्माई इंसान रहते हैं। उनका नाम है, शुभेंद्र शर्मा।
पंचायत दर्पण पोर्टल पर जाइए, वहां दर्ज आंकड़ों को देखिए। चंदली में तारीख है 12 जून 2026, ईपीओ नंबर 3911384। कॉलम में लिखा है—जेसीबी का किराया और सफाई कार्य, और भुगतान पाने वाले 'श्रमिक' साहब को सीधे 28,000 रुपये थमा दिए जाते हैं। 10 जुलाई 2026 को ईपीओ नंबर 3943011 के तहत फिर से पैसे जारी होते हैं। और अगस्त-सितंबर आते-आते तो गजब हो जाता है—कभी 80,500, कभी 85,000, तो कभी एक लाख अस्सी हजार पांच सौ रुपये (1,80,500 रुपये) के भारी-भरकम बिल पास होने लगते हैं।
ग्राम पंचायत—में कैसे-कैसे रूप बदले जाते हैं। कभी आप सोचते होंगे कि बहरूपिया सिर्फ रामलीला या नौटंकी में होता है, लेकिन नहीं, गोटेगांव की पंचायतों के कागजों में देखिए।
एक ही व्यक्ति एक ही पंचायत में दिन में 'दैनिक वेतन भोगी मजदूर' बनकर जेसीबी और सफाई के बिल लेता है और अगले ही पल 'लघु दुकानदार' बनकर स्टेशनरी व कंप्यूटर सामग्री सप्लाई करने का बिल लगा देता है! क्या पंचायत राज अधिनियम इसकी अनुमति देता है?
सोचिए, गोटेगांव में कितने ही छोटे-छोटे दुकानदार होंगे, जो सुबह दुकान खोलते हैं, शाम को शटर गिराते हैं, ईमानदारी से टैक्स देते हैं। उनकी इन पंचायतों से क्या दुश्मनी है? क्या उनका गुनाह यह है कि वे 'शुभेंद्र शर्मा' नहीं हैं? क्या वजह है कि पंचायत का पूरा का पूरा वित्तीय पोषण सिर्फ इसी एक शख्स के अलग-अलग अवतारों पर लुटाया जा रहा है?
गौर से देखिए—जहाँ-जहाँ पुरुष सरपंच हैं, वहाँ हिसाब-किताब का एक अलग ढांचा दिखता है। लेकिन जहाँ-जहाँ महिला सरपंच बैठी हैं, वहीं पर शुभेंद्र शर्मा के नाम से सबसे ज्यादा और सबसे मोटे बिल क्यों लग रहे हैं?
क्या महिला सरपंचों को मोहरा बनाकर उनके डिजिटल हस्ताक्षर या सील का दुरुपयोग किया जा रहा है?
आखिर पर्दे के पीछे महिला सरपंचों के साथ मिलकर यह शख्स ऐसा क्या करता है कि पंचायत तिजोरी के दरवाजे इसके लिए चौबीसों घंटे खुले रहते हैं?
यह बहुत बुनियादी और तीखा सवाल है। आखिर पर्दे के पीछे महिला सरपंचों के साथ ऐसा क्या चल रहा है? कौन सा ऐसा 'विशेष संबंध' या प्रशासनिक जादू है कि सिर्फ महिला जनप्रतिनिधियों के कार्यक्षेत्र में ही इस शख्स की फाइलें बिना किसी रोक-टोक के पास हो जाती हैं?
क्या महिला सरपंचों को मोहरा बनाकर उनके नाम पर कोई समानांतर वित्तीय सिंडिकेट चलाया जा रहा है? क्या महिला सशक्तिकरण का मतलब यह है कि हस्ताक्षर उनके हों और मलाई कोई 'बहरूपिया' या 'दलाल' काट ले?
स्थानीय प्रशासन, जनपद के अधिकारी और वो तमाम लोग जो फाइलें पलटा करते हैं, वे सब जानते हैं। लेकिन वे अंधे बने हुए हैं। क्योंकि जब तक इस देश में और इन गांवों में सवाल पूछना बंद कर दिया जाएगा, तब तक ऐसे ही कागजों पर मजदूर और दुकानदारी के नाम पर जनता के खून-पसीने की कमाई लुटती रहेगी।
चंदली, मवई, टिकरी और रोहिया की जनता को अब तय करना है कि वे इस तमाशा-ए-पंचायत को कब तक चुपचाप देखते रहेंगे।
सत्य और समाज के बीच की कड़ी
