'उपद्रवी' छात्र या भड़का हुआ गुस्सा? (पुलिस पर हमला...लड़कियों पर लाठियां भांजी.....)
विशेष रिपोर्ट:
सोशल मीडिया पर 22 जुलाई की देर रात दिल्ली की सड़कों पर हुए कथित बवाल, तोड़फोड़ और पुलिस झड़प से जुड़े कई वीडियो तेज़ी से वायरल हो रहे हैं।
हालांकि, इन वीडियो और दावों की आधिकारिक या स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की गई है। लेकिन इन तस्वीरों के सामने आने के बाद सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक बहस छिड़ गई है कि आखिर उस रात ऐसा क्या हुआ जिसने पूरे देश का ध्यान खींच लिया!
NEET परीक्षा और अन्य शैक्षणिक सुधारों की मांग को लेकर चल रहा विरोध प्रदर्शन अचानक हिंसक झड़पों में तब्दील हो गया! आधी रात को दिल्ली की प्रमुख सड़कों से सामने आई तस्वीरों में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तीखी झड़प, तोड़फोड़ और आगज़नी देखी गई!
"हम किसी भी तरह की हिंसा का समर्थन नहीं कर रहे हैं। पुलिस पर हमला करना, गाड़ियां तोड़ना, या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना कानूनन अपराध है और यह आंदोलन की मूल आत्मा को मार देता है। कानून अपना काम करे, हिंसा करने वालों पर सख्त कार्रवाई हो, इसमें कोई दो राय नहीं है।
लेकिन सवाल यह भी है कि इस हिंसा के पीछे कौन है और इसका जवाब हर देशवासी जानना चाहता है!
क्या ये वाकई वही छात्र हैं जो डॉक्टर, इंजीनियर या अफसर बनना चाहते हैं? या फिर हर बार की तरह युवाओं के जायज़ गुस्से का फायदा उठाने के लिए कुछ उपद्रवी और साज़िशकर्ता इस भीड़ में घुस गए हैं?
जमीनी पड़ताल और विश्लेषकों की मानें तो इस बवाल की आग में घी डालने का काम उस शर्मनाक घटना ने किया, जब 20 जुलाई को प्रदर्शन कर रही छात्राओं और लड़कियों पर लाठियां भांजी गईं!
मीडिया का एक हिस्सा बहुत आसानी से इस पूरे प्रदर्शन पर थप्पा लगा देगा और इन्हें देशविरोधी कह देगा, उपद्रवी कह देगा!जब आक्रोश में युवा लाठियां उठाते हैं, तो उन्हें तुरंत 'उपद्रवी' का टैग दे दिया जाता है!
जब अपनी आँखों के सामने साथी बहनों और छात्राओं के साथ अमर्यादित व्यवहार हुआ, तो छात्रों का बर्दाश्त का बांध टूट गया। जिस कदम को टीवी स्क्रीन पर 'अराजकता' कहा जा रहा है, छात्र उसे अपने साथियों के बचाव और आत्मसम्मान में उठा आक्रोश बता रहे हैं।
हांलांकि जब छात्रों का जायज़ आक्रोश सड़कों पर पुलिस से सीधी झड़प में बदलता है, तो इसके बड़े नुकसान भी हैं!
NEET या सीजेपी से जुड़ी जो मूल मांगें थीं, वे पीछे छूट जाती हैं और पूरी बहस 'लाठीचार्ज बनाम हिंसा' पर सिमट जाती है।
आम जनता जो पहले छात्रों की मांगों के साथ खड़ी थी, वह हिंसा और अराजकता के विजुअल्स देखकर असमंजस में पड़ जाती है।
देश के युवाओं से हमारी विनम्र अपील है कि, आपकी मांगें जायज़ हो सकती हैं, आपका आक्रोश वाजिब हो सकता है, और आपके साथ हुआ अन्याय भी सच हो सकता है लेकिन हिंसा कभी समाधान नहीं हो सकती!
याद रखिए, जब आप सड़कों पर लाठियां उठाते हैं या गाड़ियां जलाते हैं, तो आप उसी कानून को तोड़ते हैं जिसके सहारे आपको न्याय मिलना है! हिंसा केवल आपके आंदोलन को बदनाम करती है, आपके मुख्य मुद्दे को दबाती है।
© Stringer24 News | सत्य और समाज के बीच की कड़ी
