"बिना वर्दी के लठैत - ये राजधानी में कौन सा जंगलराज है?"(NEET पेपर लीक का 'इंसाफ' कर दिया?")
इस तस्वीर को ध्यान से देखिए। हाथ में लाठी है, कपड़े सादे हैं, चेहरे पर कोई पहचान नहीं.l!अब आप ही बता दीजिए कि ये पुलिस वाले हैं या भाड़े के गुंडे?"
जंतर-मंतर की सड़क पर आज यही सबसे बड़ा खौफ था। जब पुलिस की वर्दी में खड़े जवान पीछे हटते हैं और सादे कपड़ों में हाथ में लाठी-डंडे लिए ये लोग आगे आकर छात्रों पर टूटते हैं, तो समझ नहीं आता कि देश में कानून चल रहा है या जंगलराज।
अगर ये पुलिस अफसर हैं, तो वर्दी से परहेज़ क्यों? और अगर ये पुलिस वाले नहीं हैं, तो राजधानी के बीचों-बीच कानून हाथ में लेने की इजाज़त इन्हें किसने दी?
क्या इस देश में अब सवाल पूछना मना है? या फिर अपने भविष्य के लिए आवाज़ उठाना अपराध हो गया है?
इन तस्वीरों को एक बार फिर गौर से देखिए..! जंतर-मंतर की सड़कों पर पड़े वे जूते, बिखरी हुई किताबें और हवा में तैरता आंसू गैस का धुआँ-यह सब किसी दंगाई का नहीं है! यह इस देश के उन नौजवानों का है, जो रातों की नींद हराम करके NEET की तैयारी करते हैं!
कल जब आप अपने घरों में बैठकर चाय पी रहे थे, टीवी पर विज्ञापन देख रहे थे, और उधर दिल्ली की सड़क पर भारत का भविष्य घसीटा जा रहा था!
ये छात्र किसी से जंग लड़ने नहीं आए थे। ये सिर्फ यह पूछने आए थे कि हमारी मेहनत का हिसाब कौन देगा? लेकिन हमारी व्यवस्था, हमारी सरकारें और पुलिस का तंत्र युवाओं से सवाल सुनना पसंद नहीं करता।
जब प्रदर्शनकारी संसद मार्ग की ओर बढ़ने लगे, तो पुलिस ने बैरिकेडिंग लगाकर उन्हें रोक दिया! प्रत्यक्षदर्शियों और आयोजकों के अनुसार, जब छात्रों ने आगे बढ़ने का प्रयास किया, तो पुलिस बल ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए वाटर कैनन, आंसू गैस और लाठीचार्ज का प्रयोग किया!
प्रशासन का कहना है कि संबंधित क्षेत्र में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 लागू थी, जिसके तहत बिना अनुमति किसी भी प्रकार के जलूस या मार्च की मनाही थी!
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए रायसीना रोड, जनपथ और संसद मार्ग के आसपास सुरक्षा कड़ी कर दी गई तथा एहतियातन निकटतम मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश/निकास द्वार बंद किए गए!
CJP संस्थापक अभिजीत दीपके सहित कई प्रमुख प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने हिरासत में लिया!
भाजपा सरकार में एक अजीब सा दंभ आ गया है?उसे लगता है कि भारी बहुमत का मतलब है जनता को बोलने का हक खत्म कर देना! अगर किसान सड़क पर आएं, तो वे आंदोलनजीवी हैं? अगर छात्र सड़क पर आएं, तो वे उपद्रवी हैं? अगर नागरिक सवाल पूछें, तो वे देशद्रोही हैं?
तो फिर सवाल यह है कि इस देश में 'सही नागरिक' कौन है? क्या वही जो चुपचाप लाठियाँ खाए और हर नाकामी पर सरकार की तालियाँ बजाए?
जब सत्ता इतनी बेपरवाह हो जाए कि उसे अपनी ही युवा पीढ़ी की चीखें सुनाई न दें, जब लाठी की नोक पर लोकतंत्र को हांका जाने लगे-तब यह सिर्फ छात्रों का नुकसान नहीं होता! यह पूरे देश के ज़मीर की हार होती है।
यह घटना सिर्फ एक प्रदर्शन के दमन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
परीक्षा प्रणालियों में पारदर्शिता की मांग करना किसी भी परिपक्व लोकतंत्र का हिस्सा है। लाठीचार्ज और दमनकारी उपायों से तात्कालिक रूप से भीड़ को हटाया जा सकता है, लेकिन इससे मूल समस्याओं का समाधान नहीं होता।
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