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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

नागपुर की गंगा-जमुना में देखा जिंदा नरक

ग्राउंड रिपोर्ट | आँखों देखा सच

नागपुर की गंगा-जमुना की गलियों में जब मैं पहुँचा, तो लगा जैसे शहर के बीचों-बीच कोई जिंदा नरक पल रहा हो।

तंग गलियाँ… सड़कों पर खड़ी औरतें… इशारों से ग्राहकों को बुलाती लड़कियाँ… और हर तरफ ऐसा माहौल, जिसे देखकर इंसानियत तक शर्मिंदा हो जाए।

मैंने अपनी आँखों से देखा — अस्सी साल की बूढ़ी औरतें तक इस दलदल में धकेली हुई हैं, और अठारह-बीस साल की लड़कियाँ खुलेआम ग्राहकों से सौदे करती दिखाई देती हैं।

दिन भर नशे में डूबी आवाजें, गंदी गालियाँ, लड़ाई-झगड़े और चार-पाँच फुट के घुटन भरे कमरे… जहाँ जिस्म भी बिकता है और वहीं पूरी जिंदगी भी सड़ती रहती है।

सबसे ज्यादा हैरानी इस बात ने दी कि यहाँ सिर्फ मजबूरी नहीं दिखी…

कई चेहरे ऐसे थे जिन्हें देखकर लगा कि इस गंदगी को अब जिंदगी का हिस्सा बना लिया गया है। ना शर्म, ना डर… बस पैसों के लिए इंसानियत तक गिरवी रख दी गई।

इन गलियों में घूमते हुए बार-बार यही सवाल दिमाग में आया — आखिर प्रशासन, समाज और कानून इतने सालों से आँखें बंद करके क्यों बैठे हैं?

क्या शहर की चमक सिर्फ बड़े बाजारों और चौड़ी सड़कों तक सीमित है? क्या इन अंधेरी गलियों में रहने वाले लोग इंसान नहीं?

गंगा-जमुना सिर्फ एक इलाका नहीं, बल्कि समाज की नाकामी का जिंदा सबूत है। जहाँ बचपन बिकता है, जवानी सड़ती है और बुढ़ापा भी इसी दलदल में दम तोड़ देता है।

अब समय आ गया है कि इस गंदगी पर सिर्फ बहस नहीं, बल्कि सख्त कार्रवाई हो। नशे, दलाली और जिस्मफरोशी के इस जाल को जड़ से खत्म करना होगा — वरना आने वाली पीढ़ियाँ भी इन्हीं गलियों में अंधेरे का हिस्सा बनती रहेंगी।

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