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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

"तेल कम डालो, झूठे वादे ज्यादा: 'लाडली' के नाम पर प्रदेश की नीलामी का खेल!"

बयानबाजियां तो ऐसी होती हैं मानो स्वर्ग धरती पर उतार दिया गया हो, लेकिन हकीकत में शर्म और हया का राजनीति से नाता टूटे अरसा बीत गया।

यह राजनीति का वो वीभत्स चेहरा है जहां पब्लिसिटी की भूख शांत करने के लिए लाशों पर भी रोटियां सेंकी जाती हैं। जब तक चुनाव है, तब तक लोकलुभावन वादे हैं; और जब सत्ता मिल जाए, तो सारा बोझ उस गरीब और मध्यम वर्ग पर डाल दिया जाता है जो पहले से ही महंगाई की आग में झुलस रहा है।

विडंबना देखिए, युद्ध सात समंदर पार छिड़ा हो तो उसका असर भारत की रसोई तक इस कदर पहुंच जाता है कि देश के मुखिया को जनता को 'कम तेल में खाना बनाने' की नसीहत देनी पड़ती है!

सवाल जवाबदेही का है

सवाल यह नहीं है कि नागरिक को कर्तव्य निभाना चाहिए या नहीं, सवाल जवाबदेही का है।

क्या आजादी के सात दशकों बाद भी हम इतने आत्मनिर्भर नहीं बन पाए कि एक आपातकालीन स्थिति को छह महीने या साल भर झेल सकें?

भले ही खोखली बयानबाजियां की हों, लेकिन शर्म तो फिर भी नहीं आ रही होगी?

लाडली बहना को किश्त देना इतना जरूरी हो गया है कि अब पार्टी अस्तित्व ही सिर्फ इस योजना के भरोसे टिका हो!भले ही प्रदेश को कर्ज की चक्की में पीसना पड़े, गरीब को टैक्स और मंहगाई में झोंकना पड़े!

विश्वगुरु के दावों पर सवाल

सत्ता के गलियारों में 'विश्वगुरु' होने का डंका तो खूब पीटा गया, अपनी पीठ खुद थपथपाने का सिलसिला भी जोरों पर रहा, लेकिन वक्त का तमाचा जब गाल पर पड़ा तो सारे खोखले दावों की कलई खुल गई। आज विकास के वो बड़े-बड़े गुब्बारे जमीनी धरातल पर औंधे मुंह गिरे नजर आ रहे हैं।

क्या हमारा 'मजबूत भारत' इतना कांच का बना है कि बाहरी देशों की हलचल से यहां के मध्यम वर्ग की कमर टूट जाती है?

"यह कैसी लोक-कल्याणकारी नीति है, जहां एक हाथ से खैरात बांटी जा रही है और दूसरे हाथ से महंगाई और टैक्स के जरिए गरीब की थाली से निवाला छीना जा रहा है?"

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